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हौसलाः बेसहारा हुईं रुकैया तो कई परिवारों का सहारा बन गईं

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जरी-जरदोजी के लहंगे को दिखाती रुकैया खान - फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। एक साल की बच्ची के साथ जब रुकैया अपने ससुराल से अलग हुईं तो जिंदगी चौराहे पर आ खड़ी हुई। मुश्किल वक्त में पिता ने सहारा दिया, लेकिन वह किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती थीं। आत्मबल मजबूत किया। एक नई राह बनाई। जरी/जरदोजी का काम शुरू किया। आज वह करीब 50 परिवारों का सहारा बनी हुई हैं। उनके लहंगे और चुनरी भी कई राज्यों में पसंद किए जा रहे हैं।
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शहर के मोहल्ला लोदीपुर निवासी अनीस खां की बड़ी बेटी रुकैया खान की शादी 2016 में हुई थी। जिंदगी की गाड़ी कुछ दिन ही ठीक चल पाई थी कि घर में विवाद शुरू हो गए। कुछ दिन तो रुकैया सब कुछ सहन करती रहींख जब बर्दाश्त की हद हो गई तो उन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। नतीजा यह हुआ कि 2017 में शौहर ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। मासूम बच्ची के साथ जब वह बाहर निकलीं तो सामने अंधेरा था। फिलहाल वह मायके आ गईं।
रुकैया बताती हैं कि उन्हें रातों को नींद नहीं आती थी। मासूम बेटी के भविष्य को लेकर चिंता सताती थी। क्या करें, कैसे पार होगी पहाड़ जैसी जिंदगी। अवसाद की स्थिति में उन्होंने खुद को संभाला और सम्मानपूर्वक जीने की राह तलाशनी शुरू की। उन्होंने मुद्रा लोन के लिए उद्योग केंद्र में आवेदन किया। काफी दौड़भाग के बाद पांच लाख का लोन स्वीकृत हो गया।
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रुपये हाथ में आने के बाद उन्होंने पूरी मेहनत व लगन के साथ जरी/जरदोजी का काम शुरू किया। लोदीपुर, हथौड़ा, निगोही, शाहबाजनगर क्षेत्र के करीब 70 घरों में कारचोबी कराना शुरू किया। धीरे/धीरे काम रफ्तार पकड़ता गया और लोग उनके साथ जुड़ते चले गए। उनके द्वारा बनवाए गए लहंगा, चुनरी, साड़ी को दिल्ली, हरियाणा और लुधियाना में पसंद किया जाता है।
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