वो वक्त लोग भूले नहीं हैं जब पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नरसिम्हा राव के बरेली आगमन पर दरगाह के लोगों ने उनके लिए अपने दर बंद कर दिए थे लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी का इस बार दरगाह आला हजरत पर जिस तरह स्वागत हुआ उससे साफ संदेश गया है कि बदले हालात में पुरानी बातें भूल जाना ही बेहतर है। स्थानीय नेताओं के प्रयासों से दरगाह के एक कोने पर कांग्रेस के लिए हमदर्दी कहीं थी जरूर, लेकिन इस बार दरगाह प्रमुख ने जो स्नेह राहुल गांधी को दिया वह संदेश देने वाला है और इससे दरगाह को साधने के जतन कर रहे सपा और बसपा के खेमों में बेचैनी बढ़ी है।
कांग्रेस से लंबी दूरियों के बाद नए रिश्तों की शुरुआत पर यहां के लोग कहते हैं कि कुछ मसले सामने आए हैं इन पर कांग्रेस कुछ पहल करती दिखती है तो सुन्नी मसलमानों के इस गढ़ से कांग्रेस को बड़ी ताकत मिल सकती है। एक मसला उत्तराखंड में वक्फ बोर्ड और मदरसा बोर्ड का है। इसमें थोड़ा पेचोखम तो हैं लेकिन बात बन भी सकती है। उत्तराखंड के खास कर कुमायूं क्षेत्र में दरगाह कहीं अपनी अहमियत देखना चाहेगी। रही बात यूपी की तो यहां के लिए तो दरगाह का मुस्लिम एजेंडा पहले से ही साफ है कि सुन्नियों को भी तरजीह मिलनी चाहिए। पारिवारिक विवाद और दूसरे कारणों से अपने असमंजस में फंसी सपा के लिए दरगाह के कुछ अंक कम हो गए लगते हैं। दरगाह ने हमेशा एलानिया तौर पर खुद को सियासी जमातों से अलग रखने की बात कही लेकिन दरगाह के पास सियासी दलों के लिए मुस्लिम एजेंडा हमेशा रहा। पिछले 27 सालों में कांग्रेस से दूरियों की वजह से सपा और बसपा ने दरगाह को खुश रखने के लिए कुछ कदम भी उठाए लेकिन ये उल्टे ही पड़ते चले गए। सभी पार्टियों ने किसी न किसी तरह दरगाह के माध्यम से मुस्लिम वोटों को सहेजने की कोशिशि की। यहां तक कि भाजपा के नेता भी आए। एक बार तो दरगाह पर हेलीकॉप्टर से फूल भी बरसाए गए। पिछले एक दशक की बात करें तो सबसे पहले बसपा ने दरगाह को बत्ती देकर मुस्लिम वोट साधने की कोशिश की, मगर वह छह महीने ही रह पायी। अब चुनाव के माहौल में कुछ समय पहले ही बसपा के राष्ट्रीय महासचिव नसीम उद्दीन सिद्दीकी भी दरगाह पर आए मगर कतिपय कारणों से ये दौरा भी असरदार नहीं रह पाया।
सपा की ओर से पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह उनके भाई शिव पाल यादव और बेटे सीएम अखिलेश यादव तक दरगाह पर आए। अखिलेश के राज में दरगाह के नाम पर दो लाल बत्तियां भी दीं। एक आबिद खां को फिर आईएमसी के बहाने मौलाना तौकीर रजा खां को। आबिद अब दरगाह को नापसंद हैं और मौलाना तौकीर रजा खां खानदानी होने के बावजूद अपना अलग सियासी बजूद रखते हैं। कई मजहबी मसलों पर भी उनकी राय दरगाह प्रमुख से मेल नहीं खाती। हालांकि पिछले दिनों वह भी कांग्रेस के प्रति नरम होते दिखे।
इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में दरगाह और कांग्रेस के रिश्ते बहुत अच्छे बने रहे। इसके बाद नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री काल से रिश्तों में दरार आ गई। इस नाराजगी की वजह 1992 बाबरी मस्जिद की घटना थी जिसके लिए उन्हें जिम्मेदार माना गया। राव दरगाह पर हाजरी देेने आए तो उन्हें दरगाह पर आने नहीं दिया गया था। वह पूरे दिन सर्किट हाउस में रहे। तब से ये रिश्ते खट्टे ही रहे। इसके बाद भी कांग्रेस के नेता आए मगर पुरानी जैसी बात नहीं बन सकी। अब राहुल ने आकर फिर से पुराने रिश्तों को ताजा करने की कोशिश की है। दरगाह प्रमुख सुब्हानी मियां ने खुद पुराने रिश्तों का हवाला देकर पिछली यादों को ताजा किया। उन्होंने राहुल को बताया कि आपकी दादी पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी से मेरे वालिद हजरत रेहान रजा खां (रेहानी मियां) के बहुत अच्छे रिश्त रहे हैं। वह यहां आ भी चुकीं हैं और उन्होंने ही मेरे वालिद को एमएलसी बनाया था। राहुल के इस दौरे पर आम बरेलवी मुसलमान भी खुल कर नहीं कहना चाहता लेकिन कई लोगों से बातचीत के बाद लगा कि बर्फ काफी पिघल चुकी है। ये शहर के नुक्कडों पर चर्चा का विषय है। कुछ गैर राजनैतिक लोगों की राय जानी तो उनका कहना था कि राहुल का दरगाह पर जाना और सुब्हानी मियां से मुलाकात के बाद एक चौथाई लोग तो बदले लग रहे हैं। ताजुश्शरिया अजहरी मियां से न मिलने पर जरूर लोग हैरत कर रहे थे।