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सांसद वरुण गांधी बोले: यूक्रेन से लौटे छात्रों के सामने एक तरफ युद्ध की कड़वी स्मृतियां तो दूसरी ओर अधर में लटका भविष्य

Sun, 06 Mar 2022 11:22 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, पीलीभीत

सार

सांसद वरुण गांधी ने अपने ट्वीट में कहा कि यूक्रेन विवाद ने हजारों छात्रों को मानसिक रूप से तोड़ दिया है। एक तरफ युद्धभूमि की कड़वी स्मृतियां हैं। दूसरी तरफ अधर में लटका हुआ भविष्य। 
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वरुण गांधी - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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भाजपा सांसद वरूण गांधी ने युद्धकालीन परिस्थिति में यूक्रेन से मेडिकल की  पढ़ाई अधूरी छोड़कर भारत लौट रहे छात्रों की चिंताओं को दूर करने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि यूक्रेन विवाद ने छात्रों को मानसिक रूप से तोड़ दिया है। एक तरफ उनके सामने युद्ध की भयानक यादें हैं तो वहीं पढ़ाई पूरी न हो पाने के कारण उनका भविष्य अंधेरे में दिख रहा है। उन्होंने मांग की है कि  सरकार को नियमों में शिथिलता देते हुए इन छात्रों को भारतीय शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश दे देना चाहिए जिससे उनका भविष्य बर्बाद न हो।

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लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला इतना आसान नहीं है। इसके लिए नेशनल मेडिकल काउंसिल को नियमों में बड़ा बदलाव करने की आवश्यकता पड़ेगी। यह इंटर्नशिप की सुविधा केवल उन्हीं छात्रों को मिलेगी जिन्होंने यूक्रेन में अपनी चार वर्षीय मेडिकल शिक्षा पूरी कर ली है। लेकिन जिन छात्रों ने अभी तक केवल एक या दो साल की पढ़ाई ही पूरी की है, उनके लिए अभी तक कोई प्रावधान किए जाने की घोषणा नहीं हुई है। यानी असली संकट उन्हीं छात्रों के सामने है जो अभी पहले, दूसरे या तीसरे वर्ष की मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे।

एनएमसी के एक सूत्र के मुताबिक, बड़ी समस्या यह भी है कि इतनी भारी संख्या में छात्रों को समायोजित करने के लिए देश में पर्याप्त संसाधन भी मौजूद नहीं हैं। जिन संस्थानों में केवल सौ सीटें हैं, और वहां पहले ही छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, वहां इतनी अन्य छात्रों को किस आधार पर प्रवेश दिया जा सकेगा, यह इस मामले की बड़ी अड़चन है।
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गुणवत्ता तय करना बड़ा प्रश्न
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व चेयरमैन राजन शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि ऐसे छात्रों को मानवीय आधार पर प्रवेश दिया जा सकता है, लेकिन अलग-अलग देशों के छात्रों की पढ़ाई के विषय, स्तर और पढ़ाई के सिलेबस अलग-अलग होने से सबको एक छतरी के नीचे लाना बेहद मुश्किल भरा काम होगा। इन छात्रों को समायोजित करना आसान नहीं होगा। यदि किसी प्रकार इन्हें समायोजित करने की कोशिश की जाती है तो इसके बाद भी इनकी गुणवत्ता बरकरार रख पाना बेहद मुश्किल काम होगा।

टेस्ट पूरा नहीं कर पाते छात्र
सस्ती मेडिकल शिक्षा के कारण छात्र भारी संख्या में यूक्रेन, नीदरलैंड, रूस और चीन जैसे देशों में जाकर मेडिकल की पढ़ाई पूरी करते हैं। लेकिन भारत वापस आकर प्रैक्टिस करने के पहले उन्हें नेशनल मेडिकल काउंसिल द्वारा निर्धारित टेस्ट पास करना पड़ता है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि विदेशों से मेडिकल की पढ़ाई कर देश वापस आने वाले छात्रों में बहुत कम छात्रों ने ही एनएमसी का टेस्ट पास करने में सफलता हासिल की।

कितने पास, कितने फेल
2015 से 2018 के बीच के चार सालों में कई संस्थाओं का एक भी छात्र एनएमसी का टेस्ट पास नहीं कर पाया। आर्मेनिया से पढ़कर आए 1096 छात्रों में से 237 छात्र ही एंट्रेंस टेस्ट पास कर पाए, अजरबैजान के 123 छात्रों में से केवल पांच छात्र ही भारत में प्रैक्टिस करने का टेस्ट पास कर सके। इस दौरान जर्मनी से मेडिकल की पढ़ाई कर वापस आए पांच छात्रों में एक भी यह टेस्ट पास नहीं कर सका तो नीदरलैंड के 28 छात्रों में से केवल तीन छात्र और पाकिस्तान से आए नौ छात्रों में से केवल एक छात्र ही यह परीक्षा पास कर सका।   

एक अनुमान के मुताबिक, विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर भारत लौटे लगभग पांच लाख छात्र अब तक एनएमसी का टेस्ट पास नहीं कर सके हैं। ऐसे में ये छात्र घर पर बैठने के लिए मजबूर हैं। सैकड़ों विदेशी संस्थान ऐसे हैं जिनका एक भी छात्र अब तक भारत का मेडिकल प्रैक्टिस करने का टेस्ट पास नहीं कर सका है। ऐसे में यूक्रेन से भारत लौटे इन छात्रों को देश के किस संस्थान में और किस आधार पर समायोजित किया जा सकेगा, यह बड़ा सवाल है।

सरकार दे विकल्प
वहीं, छात्रों के परिजन किसी भी स्थिति में सरकार से किसी ऐसे विकल्प की उम्मीद कर रहे हैं जिससे उनके बच्चों का भविष्य बर्बाद न हो और उनकी गाढ़ी कमाई बेकार न जाए। सोनिया रोहिला पानीपत की रहने वाली हैं और मेडिकल की पढ़ाई करने वह यूक्रेन गई थीं। परिवार ने इसके लिए लगभग 20 लाख रूपये की शुरूआती व्यवस्था की थी। शनिवार पांच मार्च को सोनिया रोमानिया के रास्ते भारत आने में तो कामयाब हो गई हैं, लेकिन अब उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि उनका भविष्य क्या होगा।
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सोनिया रोहिला के चचेरे भाई सुभाष रोहिला ने अमर उजाला से कहा कि सामान्य परिवार के लोगों ने भारी कर्ज उठाकर अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ने के लिए भेजा है। यदि सरकार इन छात्रों की पढ़ाई पूरी करने का कोई विकल्प नहीं देती है तो इससे उनका भविश्य बर्बाद हो जाएगा। साथ ही कर्ज को पूरा कर पाने का कोई रास्ता न रह जाने से इन परिवारों के सामने जीने-मरने का सवाल पैदा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार को हर हाल में बच्चों की शिक्षा पूरी करने का विकल्प देना चाहिए।

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