पढ़ी लिखी व दो बेटियों की मां है युवती, नहीं आ रहे घर वाले
बरेली। महिलाओं के लिए सरकार तमाम योजनाएं बना रही है, सिर्फ इसलिए कि समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा और सम्मान मिले। मगर जब बहू-बेटियों को बेगाना समझा जाने लगे तब ये महिलाएं क्या करें। ऐसे में घुट-घुटकर जीना ही इनकी नियति बन जाती है। रामपुर के एक संपन्न परिवार की महिला ऐसे ही नारी निकेतन की चहारदीवारी के पीछे छटपटा रही है। दुर्भाग्य है कि जिन्हें वह अपना समझती थी उन्होंने ही उसे नारी निकेतन भिजवा दिया।
बदायूं की एक युवती की शादी रामपुर के ज्वैलर्स से हुई थी, जिले में वह एक हस्ती के रूप में है। दो माह पहले उनकी पत्नी को नारी निकेतन में भर्ती करा दिया गया। एनजीओ की मदद से युवती को मानसिक मंदित बताकर यहां भर्ती कराया गया। हद तो यह हो गई कि पत्नी को नारी निकेतन में छोड़ने ज्वैलर्स खुद नहीं आया, अपने ड्राइवर से उसे यहां छुड़वा दिया। चूंकि रामपुर के एसडीएम का आदेश था लिहाजा स्टाफ को युवती को भर्ती करना पड़ा। शुरू में नारी निकेतन का स्टाफ भी यही समझ रहा था कि युवती मानसिक मंदित होगी। लेकिन वह बिल्कुल ठीकठाक बातचीत कर रही है। कभी-कभार असामान्य व्यवहार जरूर कर देती है। युवती अपने घर जाना चाहती है मगर अफसोस घर वाले उसे रखने को तैयार नहीं। ससुराल वाले और न मायके वाले। घर पर फोन किए गए लेकिन युवती को लेने कोई नहीं आया। अब नारी निकेतन की चहारदीवारी ही उसकी किस्मत बन गई है।
युवती स्टाफ से बातचीत में बताती है कि उसकी दो लड़कियां हैं। बेटियों को ज्वैलर्स ने अपने पास ही रखा हुआ है। वह खुद पढ़ी लिखी है, कभी कभार अंग्रेजी के भी शब्दों का इस्तेमाल करती है। जब उसे बताया जाता है कि उसे लेने कोई नहीं आ रहा तो वह गुस्सा हो जाती है। स्टाफ पर नाराजगी करती है। माना जा रहा है कि अगर युवती को परिवार वालों को स्नेह मिले और थोड़ा इलाज होता रहे तो वह पूरी तरह से ठीक हो जाएगी।
स्टाफ के साथ घुल मिल गई है युवती
युवती को नारी निकेतन में करीब दो माह होने जा रहे हैं। पहले से उसकी हालत काफी बेहतर है। परिवार को याद करके अक्सर वह रोने लगती है। ऐसे में अब यहां का स्टाफ ही उसका परिवार बन गया है। यहां भर्ती अन्य महिलाएं उसे समझाती है। हंसी मजाक भी करती हैं ताकि उसे घर व रिश्तेदारों की कमी न खले।
युवती काफी संभ्रांत परिवार से है। उसकी दिमागी हालत काफी हद तक ठीक है। वह घर जाने की जिद कर रही है। लेकिन परिवार के लोग उसे लेने नहीं आ रहे। - छाया बड़बल, अधीक्षक, नारी निकेतन
अगर कोई मानसिक बीमार है तो उसे तभी अस्पताल या किसी संस्था में भेजना चाहिए जब उसे परिवार या आसपास के लोगों को खतरा हो। अगर गंभीर स्थिति नहीं है तो परिवार वाले ऐसे मरीजों की ठीक से देखभाल करें तब वे जल्दी ठीक हो सकते हैं।- अनुग्रह एडमंड, मनोचिकित्सक