बरेली विकास प्राधिकरण का हश्र आवास विकास परिषद से भी बुरा होता जा रहा है। बीते 13 साल से बीडीए ने कोई नया प्रोजेक्ट न करके सारा विकास बिल्डर्स के भरोसे छोड़ दिया। बिल्डर अफसर और स्टाफ को घर बैठे जेबें भरने का चस्का लगाते रहे और नकारापन ऐसा हावी हुआ कि विकास छोड़कर प्राधिकरण विनाश के रास्ते धकेल दिया गया। उसके बाद रामगंगा नगर जैसे प्रोजेक्ट फेल करवाकर बिल्डर्स को पनपाने का दौर चला। यही वजह रही कि बीते 13 साल में रामगंगा नगर आखिरी प्रोजेक्ट साबित हुआ और अब नए प्रोजेक्ट के बजाय नक्शे पास करने और अवैध निर्माण की आड़ में वसूली से जेबें भरकर अपने विकास और बीडीए के विनाश की लीला जारी है।
जम्मू कैडर के आईएएस केवी अग्रवाल के वर्ष 2000 से 2003 तक बीडीए उपाध्यक्ष थे। उनके कार्यकाल में बीडीए ने शहर को डीडीपुरम जैसी पाश कॉलोनी के अलावा संजयनगर और डेलापीर बाईपास दिए। 2004 में आरपी अरोड़ा आए। उन्होंने रामगंगा नगर में 269 हेक्टेयर जमीन खरीदी जिसमें अधिग्रहण का ऐसा पेच फंसा जो अब तक नहीं सुलझ पाया। बीडीए 13 साल से कोई नया प्रोजेक्ट शुरू नहीं कर पाया। 2016-17 में बीडीए की 138.79 करोड़ और खर्चे 118.52 करोड़ थे। बीडीए को रामगंगा नगर आवासीय योजना के लिए जमीन अधिग्रहण में किसानों को मुआवजा देने के लिए दो बार में 200 करोड़ से ज्यादा का बैंक से लोन लेना पड़ा। हाल ही में 100 करोड़ के लोन में 75 करोड़ खर्च हो चुके हैं। बीडीए के खाते में मात्र 25 करोड़ रुपये बचे हैं। उसमें ठेकेदारों का लगभग 20 करोड़ बकाया है। अगले महीने स्टाफ की सेलेरी देने के लाले पड़ सकते हैं।
आज के हिसाब से देखें तो बीडीए के खजाने में मात्र 25 करोड़ रकम है, वह भी बैंक के कर्ज वाली। जबकि किसानों की देनदारी 50 करोड़ चुकानी है। ठेकेदारों को 20 करोड़ के भुगतान भी करने हैं। इससे बड़ी चिंता स्टाफ को यह है कि 15 करोड़ हर महीने का खर्च है तो आगे सेलरी कैसे मिलेगी।
13 साल में बिल्डर पनपाए अफसरों ने
बीते 13 साल से पहले ही बिल्डरों को पनपाने का खेल शुरू हुआ। उसके बदले अफसरों और स्टाफ की जेबें भरती गईं जबकि बीडीए का रेवेन्यू घटने के साथ खजाना खाली होता गया॥ इस सोच से ऐसा नकारापन पनपा कि अब हलाल की कमाई के बजाय अवैध कमाई पर ही अफसरों और स्टाफ का जोर है।
आवासीय योजनाएं जो सफल हुईं
बीडीए की प्रियदर्शिनी नगर योजना 1987-88 में शुरू हुई। 10.73 हेक्टेयर एरिया में 13 एचआईजी, 77 एमआईजी, 66 एलआईजी, 21 एलआईजी और 45 बड़े एमआईजी भवनों का विकास किया गया। यह योजना इसलिए सफल हुई क्योंकि इसमें रहने वाले बीडीए के अफसर, इंजीनियर और कर्मचारी हैं।
दीनदयाल पुरम (डीडीपुरम)
काउंटर मैग्नेट बरेली सिटी योजना में शहर के बीच राजेंद्रनगर के निकट 1997-98 में प्रारंभ हुई। वर्ष 2000 से 2003 में तत्कालीन उपाध्यक्ष केवी अग्रवाल ने डीडीपुरम विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने नगर निगम से 130 करोड़ में 15.44 हेक्टेअर जमीन खरीदी। कूड़े के ढेर तब 243 आवासीय और 164 कामर्शियल भूखंड बनाकर 200 करोड़ से ज्यादा में बेचा गया। इसमें बीडीए को 70 करोड़ से ज्यादा की कमाई हुई। 53 आवासीय भवन अलग से बनाए गए। शहर की सबसे पाश कालोनी बसाने में तत्कालीन बीडीए उपाध्यक्ष केवी अग्रवाल का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
लोहिया विहार
दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर आईटीआर कंपनी से 11.91 हेक्टेअर जमीन पर आवासीय और कामर्शियल योजना विकसित की गई। हाईवे पर बीडीए ने यह जमीन पांच करोड़ की आईटीआर कंपनी से खरीदी थी। इसमें 289 भूखंड आवंटित कर दिए गए। । लोगों ने भूखंड खरीद लिए लेकिन उनमें रहने नहीं गए। कालोनी बनाकर बीडीए ने इस योजना से पांच करोड़ से ज्यादा कमाई की। करोड़ों की लागत से यहां बीडीए ने सड़कें, पानी की टंकी आदि बनाकर यह कालोनी नगर निगम को हैंडओवर कर दी।
बीडीए की आमदनी के स्रोत
1- आवासीय या कामर्शियल निर्माण के नक्शे स्वीकृत की फीस
2- आवासीय या व्यवसायिक कालोनी, मार्केट, शॉपिंग माल के ले आऊट पास कराने की फीस
3- पुरानी संपत्तियों के आवंटन में हर माह आने वाला किराया
4- पुरानी संपत्तियों की बिक्री से आय
5- पुराने फ्लैट आवंटन या भूखंड बिक्री से होने वाली आय
बीडीए के खर्च
1- अवस्थापना निधि में निर्माणाधीन सड़कें
2- पार्क निर्माण और उनके रखरखाव जैसे बिजली, पानी, सीवर, खनन पर खर्च
3- आवासीय या कामर्शियल निर्माण पर खर्च
4- मलिन बस्ती और पर्यावरण सुधार पर खर्च
5- भूमि अधिग्रहण पर होने वाला खर्च
6- स्टाफ को हर माह देने वाले वेतन भत्ते पेंशन पर खर्च
बीडीए की आमदनी का संक्षिप्त आकलन (आंकड़े लगभग में)
आय पक्ष ---(2016-17)
स्रोत धनराशि
नक्शों से आय 11.24 करोड़
विकास शुल्क 16.50 करोड़
संपत्ति से आय 19.05 करोड़
कंपाउंडिंग से आय 29.00 करोड़
संपत्ति से अर्जित किराया 27.92 करोड़
कुल योग 103.371 करोड़
अन्य मदों से आय 35.42 करोड़
कुल आय 138.79 करोड़
वर्ष 2017-18 में कुल आय -- 238.20 करोड़
(30 सितंबर तक)
व्यय पक्ष --- (2016-17)
मद धनराशि
जमीन खरीद पर खर्च 30 करोड़
ब्याज एवं मूलधन वापसी 26.24 करोड़
प्रशासनिक व्यय 14.49 करोड़
योजनाओं की वापसी 4.83 करोड़
कुल योग 75.56 करोड़
अन्य व्यय 42.96 करोड़
कुल खर्च 118.52 करोड़
वर्ष 2017-18 में कुल व्यय -- 204.02 करोड़
(30 सितंबर तक)
वर्ष 2016-17 में कुल बचत -- 20.27 करोड़
(वर्ष 2017-18 की बचत आकलन 31 मार्च को किया जाएगा)
फ्लाप हो गईं यह योजनाएं
1- एकता नगर 2- मथुरापुर योजना 3- रामपुर रोड आश्रयहीन योजना 4- बिहारमान नगला 5- भाऊराव देवरस योजना 6- वाल्मीकि अंबेडकर मलिन बस्ती आवासीय योजना सैदपुर हाकिंस 7- वाल्मीकि अंबेडकर मलिन बस्ती आवासीय योजना तुलापुर 8- रामपुर रोड भाऊराव देवरस योजना 9- ईडब्ल्यूएस 99 भवन तुलापुर आवासीय योजना 10- टीबरीनाथ आवासीय योजना। 11- हरूनगला योजना 12- करगैना आवासीय योजना 13- ट्रांसपोर्ट नगर।
रामगंगा नगर
2004 में प्रारंभ इस योजना में चार गांव चंदपुर बिचपुरी, मोहनपुर उर्फ रामनगर, डोहरिया, अहिरोला में 269.965 हेक्टेअर जमीन अधिग्रहण प्रस्तावित थी। बीडीए ने बिना किसी ठोस प्लानिंग बनाए बीडीए ने इसमें बड़ी रकम फंसा दी। आवंटियों को बिना जमीन अधिग्रहण कराए प्लाट आवंटित कर दिए गए। 13 साल से वह अपने भूखंड पर कब्जा पाने के लिए चक्कर काट रहे हैं। बीडीए को किसानों का मुआवजा देने के लिए 225 करोड़ का कर्ज लेना पड़ा। केवल कमाने खाने के लिए बीडीए ने रामगंगा में सीवर लाइन बिछा दी। जंगल में बिजली के तार खिंचा दिए। बिना कामर्शियल डेवलपमेंट किए दो हजार से ज्यादा आवास बना डाले। अब इनमें कोई रहने वाला नहीं है। ढाई सौ से ज्यादा आवास बिक नहीं रहे।
कोट--
बीडीए को शासन से कोई भी बजट नहीं मिलता। हम अपनी आमदनी करके स्टाफ को सातवां वेतन आयोग के वेतन भत्ते और पेंशन भत्ते आदि देते हैं। रियल एस्टेट कारोबार में मंदी से आमदनी में कमी हो गई है। रामगंगा नगर में कामर्शियल प्लाट आवंटित कर आमदनी बढ़ाने का प्रयास किए जा रहे हैं। किसानों का मुआवजा देने के लिए बैंक से लोन लिया गया है। डॉ. सुरेंद्र कुमार पांडेय, उपाध्यक्ष बीडीए