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BAREILLY : दावत-ए-इस्लामी के लिए हर महीने इकट्ठा होता है लाखों का चंदा, कहां जाती है यह रकम, किसी को पता नहीं

Mon, 04 Jul 2022 09:47 PM IST
वेद प्रकाश गुप्ता संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली

सार

उदयपुर के कन्हैया हत्याकांड में पाकिस्तानी संगठन दावत-ए-इस्लामी का नाम आने के बाद खुफिया एजेंसिंयां एलर्ट हो गईं हैं। बरेली मंडल के जिलों में वर्षों से दावत-ए-इस्लामी के चंदे के बॉक्स हजारों दुकानों पर रखे हुए हैं। इस रकम के बारे में किसी को भी जानकारी नहीं है कि यह रकम कहां जाती है। पीलीभीत के शहर काजी मौलाना जरताब रजा खां के इशारे के बाद इसको लेकर अलर्ट जारी हुआ है।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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उदयपुर में कन्हैयालाल के पाकिस्तानी संगठन दावत-ए-इस्लामी से जुड़े होने के खुलासे के साथ बरेली में खुफिया विभाग की बड़ी नाकामी उजागर हुई है। बरेली मंडल केचारों जिलों में यह संगठन न सिर्फ बरसों से सक्रिय है, बल्कि हर महीने लाखों का चंदा भी इकट्ठा कर रहा है। हालांकि यह किसी को खबर नहीं है कि लाखों की यह रकम कहां जाती है और किस काम के लिए इस्तेमाल होती है।

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पाकिस्तानी संगठन दावत-ए-इस्लामी के लाखों का चंदा जुटाने की यह खबर शायद अब भी आम नहीं होती,अगर हाल ही में पीलीभीत के शहर काजी मौलाना जरताब रजा खां इस ओर इशारा न करते। मौलाना जरताब रजा के इस संगठन पर आपत्ति जताए जाने के बाद अब पुलिस और खुफिया विभाग भी सक्रिय हुआ है। बरेली मंडल के बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर और बदायूं समेत चारों जिलों में अलर्ट का निर्देश दिया गया है।

पुलिस के उच्चाधिकारी अब इस संगठन की गतिविधियों पर नजर रखने की बात भी कह रहे हैं। दावत-ए-इस्लामी बरेली मंडल के जिलों में किस हद तक सक्रिय है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दावत-ए-इस्लामी के चंदे के बॉक्स तमाम दुकानों पर रखे हुए हैं। कई मस्जिदों में यह पाकिस्तानी संगठन मदरसे भी चला रहा है। हालांकि पीलीभीत के शहर काजी का बयान आने के बाद दुकानों से चंदे के बॉक्स हटाए जाने लगे हैं।

 

कुर्बानी में भी हिस्सेदारी से होती है लाखों की कमाई
दावत-ए-इस्लामी के लोग हिस्से वाली कुर्बानी के लिए भी पैसा जमा करते है। हिस्से वाली कुर्बानी बड़े जानवर के लिए होती है जिसे सात लोग पैसा देकर कराते हैं। यह संगठन मीट लेने वाली कुर्बानी के साथ मीट न लेने वाली कुर्बानी भी कराता है। जिस कुर्बानी में मीट नहीं लिया जाता, उसमें पैसा ज्यादा बचता है। इसके बाद जानवरों की खाल पर भी इसी संगठन का हक होता है, इससे भी उसे लाखों की कमाई होती है। रमजान में भी दावत-ए-इस्लामी को एक जिले से लाखों की कमाई हो जाती है।

 

बड़ी दुकानों से बड़ा चंदा, दी जाती है रसीद
दावत-ए-इस्लामी के लोग इस्लाम के प्रचार-प्रसार के बहाने दुकानों पर चंदे का बॉक्स लगा देते है। बताया जाता है कि इस बॉक्स की चाबी संगठन के किसी पदाधिकारी के पास रहती है। बड़ी दुकानों और व्यापारियों से पर्ची सिस्टम के जरिए हर महीने एक तयशुदा रकम ली जाती है। किसी दुकान मालिक को ही रकम इकट्ठी करने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।

 

मौलाना जरताब रजा के पिता ने भी की थी प्रतिबंध लगाने की मांग, सोते रहे अफसर
खुफिया विभाग की निष्क्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मौलाना जरताब रजा खां के पिता ने भी 1999 में इस संगठन की गतिविधियों को संदेहास्पद बताते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी लेकिन उस पर न अफसरों ने ध्यान दिया न ही खुफिया विभाग ने। दावत-ए-इस्लामी खुद को लोगों को इस्लाम की ओर दावत देने वाला संगठन बताता है। उदयपुर हत्याकांड के बाद पीलीभीत के शहर काजी के उसे आतंकवादी संगठन बताए जाने के बाद यह भी सवाल खड़ा हो गया है कि यह संगठन किस मकसद से इस्लाम में आने की दावत देता है।

 
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रेंज में सतर्कता बढ़ाने के निर्देश दे दिए है। संगठन की हर गतिविधि पर नजर रखने को कहा गया है। खुफिया विभाग के साथ पुलिस के मुखबिर तंत्र को भी एक्टिव किया गया है।- रमित शर्मा, आईजी रेंज
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