बरेली। ब्रिटिश हुकूमत के समय से चौबारी में लगते आ रहे नखासे की रौनक अब खत्म होने लगी है। कभी समय था जब यहां हाथी, ऊंट के साथ गोवंशीय पशु भी बहुतायत में बिका करते थे। तब इस मेले में दूर-दूर से लोग पशुओं की खरीद-फरोख्त करने आते थे। हाथी और ऊंट तो चार-पांच दशक पहले ही इस मेले में आने बंद हो गए, पिछले पांच साल से गोवंशीय पशु बिक्री के लिए नहीं आ रहे हैं। कई सालों से इस मेले में सिर्फ घोड़े ही आ रहे थे लेकिन ग्लैंडर्स के बढ़ते खतरे के साथ ई-रिक्शा, टेंपो और छोटा हाथी के बढ़े इस्तेमाल ने घोड़ों की खरीद-फरोख्त पर भी विराम लगा दिया है। तीन दिन लगने वाले नखासे में इस बार आठ सौ से ज्यादा घोड़े पहुंचे हैं लेकिन इनमें से अभी 138 घोड़े ही बिक पाए हैं।
1925 में पंचों ने की थी शुरुआत
80 वर्षीय गांव निवासी छोटे सिंह ने बताया कि 1925 में गांव में पांच लोगों की कमेटी ने नखासा की शुरुआत की थी। इसमें उनके पिता महादेव सिंह भी शामिल थे। छोटे सिंह ने बताया कि जब वह 18 साल के थे तभी से उन्होंने कमान अपने हाथ में संभाल ली थी। तब से उनका परिवार ही नखासा का संचालन करता आ रहा है। बताया कि पहले काफी बड़ा नखासा लगता था। अच्छे नस्ल के बैल, भैंस, गाय, बछड़े, घोड़े के अलावा शुरू के कई साल तक कुछ हाथी व ऊंट भी बिकने आते थे। करीब पांच दशक पहले ऊंट, हाथी आना बंद हो गए। 2014 के बाद से मेले में गोवंशीय पशुओं की भी आमद कम हो गई थी। 2017 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद एक तरह से गोवंशीय पशुओं की बिक्री पर पूरी तरह पाबंदी लग गई। इसके बाद से इस नखासा में बिकने के लिए सिर्फ घोड़े ही आते हैं। पहले नखासा की अनुमति प्रशासन कई दिन पहले देता था, लेकिन दो-तीन साल से प्रशासन एक दिन पहले अनुमति देता है। लिहाजा प्रचार प्रसार नहीं हो पाता। ग्लैंडर्स के बढ़ते खतरे को लेकर भी नखासा में कम ही घोड़े पहुंच सके हैं।
कम बिक्री से घोड़ा विक्रेता चिंतित
पिछले कई साल से घोड़ा बेचने आता हूं। इस बार भी दो घोड़े लेकर एक दिन पहले आ गया था। 30 हजार रुपये तक की कीमत के उनके पास घोड़े हैं। पर अभी तक कोई भी खरीदार नहीं आया है। पहले कम वाहन होते थे। तब घोड़ों की बिक्री अधिक होती थी। तांगे में सवारी के साथ सामान ढोने का अधिकतर काम भी घोड़ों से ही होता था। अब ई-रिक्शा, छोटा हाथी (पिकप) का प्रचलन बढ़ने से घोड़ों की बिक्री घट रही है।
- बनारसीदास, ग्राम चेनेहटा, बरेली
पिछले चार साल से घोड़ा बेचने आ रहा हूं। इससे पहले मेरे पिता आते थे। पांच घोड़े बिक्री के लिए लाया हूं। 15 से 35 हजार रुपये कीमत के उनके पास घोड़े हैं। तीन हजार रुपये उन्हें लाने में भाड़ा खर्च हुआ है। दाना-पानी पर भी 500 रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं। पहले तांगे, बग्गी में अच्छी कमाई हो जाती थी। परिवार की रोजी रोटी ठीक चलती थी। अब बैट्री रिक्शा, कार, पिकअप चल जाने से तांगे, बग्गी में बैठना व सामान ले जाना कम लोग ही पसंद करते हैं। घोड़ा कोई खरीदने वाला नहीं आया।
- सलीम, रीठ, मुरादाबाद