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साल भर बाद भी खतौनी में नहीं हुए असली नाम दर्ज

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बरेली। माफिया के इशारे पर सरकारी सिस्टम को खतौनियों को खुरचकर सैकड़ों बीघा जमीनों के मालिकों के नाम गायब करने में देर नहीं लगी, लेकिन जांच में सब कुछ साफ होने के बाद भी खतौनियों को दुरुस्त करने का काम रत्ती भर आगे नहीं बढ़ पा रहा है। माफियागर्दी के शिकार हुए जमीनों के मालिक 13 महीनों से खतौनियों में पहले की तरह अपने नाम दर्ज कराने के लिए कलक्ट्रेट के चक्कर काट रहे हैं हैं लेकिन सिस्टम अब भी राजस्व रिकॉर्ड में माफिया और उनके गुर्गों को ही उनकी जमीनों का मालिक बनाए हुए हैं। इन लोगों का दुखड़ा यह है कि अफसर भी उनकी फरियाद सुनने को तैयार नहीं हैं।
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फरीदपुर तहसील के फतेहगंज पूर्वी की सैकड़ों बीघा जमीनों की खतौनियां करीब 13 महीने पहले कलक्ट्रेट के रिकॉर्ड रूम के स्टाफ की सांठगांठ से निकलवाकर उन्हें खुरच दिया गया था और जमीनों के असली मालिक का नाम उड़ाकर अपने मनमाफिक नाम दर्ज करा लिए गए थे। इस खेल का पर्दाफाश तब हुआ हुआ जब फतेहगंज पूर्वी में रहने वाले अख्तिदार अली खां और उनके खानदान के 20 लोगों के साथ शफायत अली खां, पूर्व टाउन एरिया चेयरमैन रिजबान बेग, तिलहर-कटरा (शाहजहांपुर) के पूर्व विधायक वीरेंद्र प्रताप सिंह मुन्ना और राजेंद्र प्रसाद मिश्रा ने अपनी जमीन की खतौनियाें में उनका नाम मिटाकर नए नाम दर्ज कर दिए जाने की शिकायत की।
अमर उजाला ने इस सनसनीखेज मामले को प्रमुखता से उठाया तो प्रशासन हरकत में आया। जांच शुरू हुई तो जालसाजी के पूरे खेल का खुलासा हो गया। खतौनी खुरचने मेें फतेहगंज पूर्वी के आबिद बेग के बेटे वाहिद बेग, ताहिर बेग, फैयाज बेग, मोहम्मद बेग और आसिव बेग के अलावा जाहिद बेग और शाहिद बेग का हाथ सामने आया। पता चला कि इन लोगों ने कलक्ट्रेट और फरीदपुर रजिस्ट्री दफ्तर के पांच कर्मचारियों की मदद से पूरे घोटाले को अंजाम दिया था। जांच के बाद इन सबके खिलाफ कोतवाली सदर और थाना फरीदपुर में एफआईआर दर्ज कराई गई। प्रशासन की जांच की तरह पुलिस ने भी विवेचना को लटका दिया। इस बीच आरोपियों की ओर से शिकायतकर्ताओं को धमकियां तक दी जाती रहीं।
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धमकियों के बाद मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ा तो पुलिस ने विवेचना निपटाकर बेग परिवार के आरोपियों को तो जेल भेज दिया लेकिन कलक्ट्रेट और तहसील के दोषी कर्मचारियों के नाम विवेचना में निकाल दिए गए। रिकॉर्ड रूम में नए कर्मचारियों की ड्यूटी लग गई, लेकिन प्रशासन के अफसरों ने खतौनियों को दुरुस्त कराने में फिर भी दिलचस्पी नहीं ली। 13 महीने बीतने के बाद भी असली जमीन मालिक के नाम खसरा-खतौनी में दर्ज नहीं किए। वे लगातार चक्कर काट रहे हैं। कई बार वे खतौनियां खुरचवाने वाले गिरोह से जान का खतरा बता चुके हैं लेकिन प्रशासन उनकी फरियाद सुनने को तैयार नहीं है।
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