बांदा। गर्मी शुरू होते ही चित्रकूटधाम मंडल में पेयजल संकट की आहट मिलने लगी है। अबकी ग्रामीणों और शहरियों से ज्यादा मवेशियों के लिए पानी के लाले पड़ सकते हैं। वर्षा ऋतु में पर्याप्त बारिश न होने से मंडल के अधिकांश बांधों में पानी का जबरदस्त टोटा है। पशुओं की प्यास बुझाने के लिए नहर चलाकर तालाब भरना भी अबकी दूभर साबित होगा। चित्रकूटधाम मंडल के मुख्य बांध रनगवां सहित बरुआ, मझगवां, उर्मिल आदि बांधों में नाममात्र को पानी बचा है।
मंडल के चारों जनपदों में कुल 13 बांध हैं। सिंचाई विभाग इन्हीं से पूरे वर्ष नहरें चलाता है। कई पेयजल योजनाएं भी इन्हीं पर निर्भर हैं। इस वर्ष बारिश से बांधों में पर्याप्त पानी का भंडार नहीं हो सका। बारिश का मौसम खत्म होने के चार माह बाद ही बांधों में पानी का संकट विकराल नजर आने लगा है।
गर्मी के मई-जून महीनों में सिंचाई विभाग बांधों में सुरक्षित किए गए पानी को नहर के जरिए तालाबों तक पहुंचाता है। यह पानी सिर्फ पशुओं के लिए होता है। इसमें सिंचाई या अन्य कार्य के लिए पानी लेने पर प्रतिबंध है। बांदा जनपद में कई सैकड़ा तालाब नहरों से भरे जाते हैं।
खासकर गंगऊ, बरियारपुर और रनगवां बांधों से इनमें पानी भरा जाता है। लेकिन अबकी स्थितियां कुछ ज्यादा ही खराब हैं। सिंचाई विभाग के बांध संबंधी ताजे आंकड़े इसके गवाह हैं। सिंचाई विभाग के मुताबिक बांदा जनपद को नहर से पानी उपलब्ध कराने वाले मुख्य रनगवां बांध में सिर्फ 5 फीसदी (7.79 मिलियन घनमीटर) पानी है।
गंगऊ में 12 प्रतिशत (6.75 मिलियन घनमीटर) और बरियारपुर में मात्र 4.19 मिलियन घनमीटर पानी है। चित्रकूट के ओहन बांध में मात्र 2 प्रतिशत, बरुआ बांध में 4 प्रतिशत, महोबा के उर्मिल बांध में 3 प्रतिशत पानी है। महोबा का मझगवां बांध पूरी तरह पानी से खाली हो चुका है। अगले दो महीनों में बारिश न होने पर पानी की यह मात्रा और घट जाएगी। सिंचाई विभाग अभियंताओं का कहना है कि जो पानी बांधों में सुरक्षित है उससे जरूरत के मुताबिक नहर चलाकर तालाब भरने की कोशिश की जाएगी।
बालू का अवैध खनन और सिल्ट से घटी क्षमता
बांदा। बांधों और नदियों से भरपूर चित्रकूटधाम मंडल में पानी का संकट गहराने की एक बड़ी वजह यह भी है कि बांधों और नदियों की क्षमता बड़े पैमाने पर कम हो गई है। बांधों की सफाई न होने से तलहटी पर भारी मात्रा में सिल्ट जमा हो गई है। जिससे यह छिछले हो गए हैं। पानी भंडारण कम हो गया है। उधर, नदियों में भी यही स्थिति है। नदियों की दुर्दशा सबसे ज्यादा बालू खनन में हो रही है। भूजल और पर्यावरण विभागों की अनेकों बार चेतावनियों के बावजूद इस पर रोक नहीं लग रही।
गंगऊ की क्षमता 3550 से 1995 लाख घनमीटर रह गई
बांदा। बांधों की स्थिति यह है कि इनकी क्षमता लगभग आधी के करीब रह गई है। वर्ष 1915 में गंगऊ बांध बनाया गया था। तब इसकी क्षमता 3550 लाख घनमीटर पानी की थी। अब यह घटकर लगभग 1995 लाख घनमीटर रह गई है। इसी तरह 1957 में बने रनगवां बांध की क्षमता निर्माण के समय 5800 लाख घनमीटर थी। यह अब घटकर लगभग 5480 लाख घनमीटर रह गई है। वर्ष 1906 में बना बरियारपुर वियर भी सिल्ट जमा हो जाने से छिछला हो गया है। इसमें ज्यादा पानी नहीं रुक पा रहा है। यह तीनों बांध केन नदी में बने हैं।