बांदा जिला अस्पताल में मरीजों की कतार।
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बांदा। कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य विभाग की तैयारियों के तमाम दावों की पोल खोलने के लिए बांदा जनपद में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं काफी हैं। आम तौर पर यहां डाक्टरों और रोग विशेषज्ञों का टोटा हमेशा रहा। लेकिन कोरोना संक्रमण के संकट काल में भी स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी यहां के लिए नहीं पसीजे। मंडल मुख्यालय के जिला अस्पतालों में डाक्टरों के पद बदस्तूर खाली रहे। कई महत्वपूर्ण रोगों के विशेषज्ञों की नियुक्ति नहीं हुई। यह स्थिति आज भी बरकरार है।
जिला पुरुष अस्पताल में चिकित्साधिकारियों के 27 स्वीकृत पदों में 12 रिक्त हैं। ट्रामा सेंटर में 9 चिकित्साधिकारियों में 3 की कुर्सियां खाली हैं। इसी तरह जिला महिला अस्पताल में कोई स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं है। स्वीकृत इकलौता पद भी रिक्त है।
औषधि भंडार के प्रभारी अधीक्षक एनेस्थेटिस्ट, रेडियोलाजिस्ट, पैथालाजिस्ट, ईएमओ (चिकित्साधिकारी) और वरिष्ठ विशेषज्ञ महिला (पीपीसी) जैसे महत्वपूर्ण पद भी रिक्त होने से दूसरे डाक्टरों से काम लिया जा रहा है। यहां कुल 8 चिकित्साधिकारियों में चार ही कार्यरत हैं। मंडल मुख्यालय के अस्पताल में चेस्ट फिजीशियन और स्किन विशेषज्ञ नहीं हैं।
पुरुष और महिला अस्पतालों में डाक्टरों की कमी की यह तस्वीर जन सूचना अधिकार अधिनियम में समाजसेवी प्रमोद आजाद को दोनों अस्पतालों के मुख्य चिकित्साधीक्षक ने दी है। डाक्टरों की यह कमी कोरोना काल में भी पूरी नहीं हुई।
कोई डाक्टर नहीं कर रहा निजी प्रैक्टिस, सब को एनपीए
बांदा। आरटीआई में दी गई सूचना में पुरुष और महिला अस्पतालों के मुख्य चिकित्साधीक्षकों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि उनके यहां कार्यरत कोई डाक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर रहा, न ही कर सकता है। इनमें से किसी का नर्सिंग होम भी नहीं है। यह भी बताया है कि सभी चिकित्सकों को एनपीए (नॉन प्रैक्टिस भत्ता) दिया जा रहा है। उधर, सूचना हासिल करने वाले समाजसेवी प्रमोद आजाद ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं। कहा है कि तमाम सरकारी डाक्टर अपने आवासों या निजी नर्सिंग होम में जाकर प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं। छद्म नाम से अस्पताल चल रहे हैं।