The damaged body of a teenager found in Usra drain...
- फोटो : BANDA
बांदा। मोहर्रम मनाने वालों और ताजियादारों पर अबकी अजब बीती। 10 दिवसीय आयोजनों में एक भी दिन मातम, ढोल, ताशा, ताजिया, ढाल, अलाव, अलम का सरेराह प्रदर्शन नहीं कर पाए। रविवार को 10 वीं भी सन्नाटे में गुजरी। शासन-प्रशासन ने ढाल सवारी और ताजियों आदि के विसर्जन जुलूस की अनुमति नहीं दी। नवमी की रात सन्नाटे और सुनसान सड़कों पर बीती। 10 वीं को भी मेला और कर्बला की धूमधाम नहीं हो पाई।
बांदा सहित पूरे बुंदेलखंड में मोहर्रम के शुरुआती 10 दिनों में विभिन्न आयोजन होते हैं। यहां की कुछ रस्में तो पूरे देश से अलग हैं, लेकिन इस साल कोरोना की पाबंदियों ने यहां पिछले करीब 270 सालों से चली आ रही मोहर्रम की कई रस्मों को रोक दिया।
मोहर्रम मनाने वाले अकीदतमंद मन मसोस कर रह गए। शनिवार की रात बीती नवमी मोहर्रम थी। इस पूरी रात अलाव, ढाल सवारी की धूम रहती थी। अलबत्ता कुछेक इमामबाड़ों के अलावों में नाममात्र के अंगारे रखकर अलाव की रस्म अदा कर ली गई। ढाल सवारियां इमामबाड़ों से बाहर नहीं निकल सकी। रविवार को 10 वीं पर भी पुलिस जगह-जगह तैनात रही।
कोई विसर्जन जुलूस या लोगों का जमघट नहीं हो सका। बहुत ही सादगी और खामोशी के साथ कुछ ताजियों को नदी में सुपुर्दे आब कर दिया गया। ढाल, अलम आदि इमामबाड़ों में ही खोलकर ‘ठंडे’ कर दिए गए। फातिहा ख्वानी और घरों में कुरान ख्वानियां हुईं।