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मंडल के खेतों से गायब हो रहा नाइट्रोजन

Thu, 23 Aug 2018 11:29 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, बांदा
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बांदा की प्रयोगशाला में मिट्टी के नमूनों की जांच करते विशेषज्ञ। - फोटो : अमर उजाला
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रासायनिक खादों का खेतों में बढ़ते प्रयोग से खेतों की सेहत बिगड़ रही है। चित्रकूटधाम मंडल में मुख्य पोषक तत्वों में आ रही गिरावट खतरे की घंटी है। नाइट्रोजन की मात्रा न्यूनतम स्तर तक पहुंच गई है। सबसे ज्यादा गिरावट मंडल के बांदा जिले में आई है।

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अधिक अनाज की उत्पादन की होड़ में किसान रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल खेतों में करने लगे हैं, जिसका असर खेत की मिट्टी के पोषक तत्वों पर भी पड़ रहा है। मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में नमूनों की जांच के बाद जो परिणाम सामने आए हैं वह बहुत ही चौंकाने वाले हैं। नमूनों की जांच से पता चला है कि मिट्टी में मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन घट रहा है। इसकी उच्चतम मात्रा 180 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, पर बांदा जनपद में मौजूदा समय में यह घटकर 45 से 112.50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पहुंच गया है। यह न्यूनतम स्तर है। महोबा जिले में न्यूनतम व मध्यम स्तर के बीच में है। यहां 90 किलो से 123.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन पाया गया है।

यह मध्यम स्तर पर है। हमीरपुर और चित्रकूट जनपद की स्थिति इन दोनों जनपदों की तुलना में बेहतर है। मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की रिपोर्ट के मुताबिक, हमीरपुर में 101.25 से 157.50 किलोग्राम एवं चित्रकूट में 123.75 किलोग्राम से 196.25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन पाया गया। फास्फोरस व पोटाश भी मुख्य पोषक तत्वों में शामिल हैं। मिट्टी में इनकी मात्रा भी उच्चतम स्तर पर होनी चाहिए, पर इन दोनों तत्वों में भी कमी आ रही है। यह मध्यम और न्यूनतम स्तर पर आ गए हैं। फसलों में दाने की चमक व अच्छे उत्पादन के लिए यह दोनों पोषक तत्व जरूरी हैं।
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खेतों से लिए जाने वाले मृदा नमूनों से एनपीके (नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश) सहित 12 पोषक तत्वों की जांच की जाती है, जिसमें एनपीके के अलावा सल्फर, जिंक, बोरान, आयरन, मैग्नीज, कॉपर, पीएच (पॉवर ऑफ हाईड्रोजन), ईसी (विद्युत चालकता) एवं ओसी (आर्गेनिक कार्बन) शामिल हैं।

दो सालों से नहीं मिला ढैंचा का बीज
मिटटी में पोषक तत्वों को बढ़ाने में हरी खाद का खास महत्व है। यह मुख्यत: ढैंचा से तैयार होती है। पहले किसानों को इसके बीज दिए जाते रहे हैं, पर दो सालों से बीज नहीं मिल रहे। इससे ढैंचा की खेती का ग्राफ बुरी तरह गिरा है। उप कृषि निदेशक दिनेश सिंह ने बताया कि ढैंचा की बुआई के लिए लक्ष्य तो मिला था, पर बीज नहीं मिल पाया। इसकी वजह से किसान बुआई नहीं कर पाए।

रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग के चलते मृदा में नाइट्रोजन जैसे मुख्य पोषक तत्वों की कमी आने से उर्वरकता एवं उत्पादन क्षमता घट रही है। मृदा सुधार के लिए जरूरी है कि जैविक (सड़े गोबर, कंपोस्ट और ढैंचा) खादों का प्रयोग करना होगा तभी पैदावार बढ़ेगी और मृदा संरचना में सुधार होगा।
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- वीपी सचान, सहायक निदेशक, क्षेत्रीय भूमि परीक्षण प्रयोगशाला, बांदा
 

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