बांदा। लॉकडाउन के बाद काम-धंधे बंद होने के बाद मुंबई से लौट रहे श्रमिकों का कहना है कि परदेस में जितना कमाया नहीं, उससे ज्यादा घर आने में गंवा दिए। पैदल चलने के अलावा अन्य कष्ट सहने पड़े सो अलग। इनका कहना है कि गांव में कोई भी कार्य कर लेंगे, किंतु परदेस नहीं जाएंगे।
मुंबई से लौट रहे सतीश कुमार, राजेंद्र वर्मा, शिवम गुप्ता, प्रदीप, भूपेंद्र श्रीवास, रामदुलारे, श्यामकिशोर समेत आठ श्रमिक धूप में तपती सड़क से गृह जनपद चित्रकूट जा रहे थे। झांसी से 220 किमी पैदल चलकर बांदा पहुंचे ये श्रमिक शहर में कुछ देर रुकने के दौरान पैरों में छाले पड़ने से हुए जख्मों पर अपने हाथ फेरते रहे।
इन्होंने बताया कि वे मुंबई में टाइल्स और कागज फैक्टरी में काम करते थे। वहां दस से 15 हजार रुपये प्रति माह कमा लेते थे। बताया कि लॉकडाउन के बाद सभी किराए के कमरे में कैद होकर रह गए। मकान मालिक घर खाली कराने का दबाव बना रहा था। फिर सबने पैदल घर चलने का मन बनाया। वहां रहने वाले अपने दोस्तों से पांच-पांच हजार रुपये उधार लिए और फिर 1370 किमी के सफर पर निकल पड़े।
रास्ते मे इटारसी के पास ट्रक मिल गया। आठों ने 3500-3500 रुपये मिलाकर ट्रक का 28 हजार रुपये किराया अदा किया। ट्रक ने झांसी लाकर छोड़ दिया। बताया कि महाराष्ट्र से पांच दिन में यहां पहुंचे हैं। बताया रास्ते में भी खाना आदि पर रुपये खर्च हो गए। झांसी से पैदल ही आ रहे हैं। अब उनके पास मात्र 20 से 100 रुपये ही बचे हैं। यह भी बताया कि रास्ते में कई जगह खाने के लिए लाइन तक लगानी पड़ी। इस सफर में इतनी मुसीबतों का सामना किया है कि जिंदगी भर नहीं भूलेंगे।
चाहे खाएं का रहै न रहै, घर पर रहिबे, परदेस न जइबे
अब हियै कमईबै। परदेस ना जइबे। चाहे खाएं का रहै या ना रहै। जऊन तकलीफ सही है दिलही जानत हवै। महाराष्ट्र के कुर्ला से 5 दिनों में बांदा पहुंचे जत्थे में शामिल आठ मजदूरों ने लॉकडाउन से हुई समस्या और सफर की दिक्कतों पर कुछ यूं बयां किया अपना दर्द। कहा कि अब वे दोबारा महाराष्ट्र काम करने नहीं जाएंगे।