बांदा। अपने बच्चों को केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाने की यहां के अभिभावकों की तमन्ना पूरी नहीं हो पा रही है। एक दशक पूर्व विद्यालय को मंजूरी मिलने के बाद वे सिर्फ सब्जबाग देख रहे हैं। दरअसल तकरीबन पौने दो लाख एकड़ क्षेत्रफल वाले जनपद में केंद्रीय विद्यालय के लिए प्रशासन मात्र आठ एकड़ जमीन की तलाश नहीं कर पाया है।
केंद्रीय विद्यालय समिति की शर्त है कि भूमि या भवन मुफ्त मिले। ऐसे में प्रशासन ने जो इक्का-दुक्का जमीन प्रस्तावित कीं, उन्हें समिति ने मानक पर खरा न उतरने की वजह से खारिज कर दिया। अब शुक्रवार को यह मुद्दा लोकसभा में गरमाने के बाद अभिभावकों को उम्मीद जागी है कि शायद केंद्रीय विद्यालय जल्द खुल जाए।
बांदा में केंद्रीय विद्यालय की स्थापना के लिए एक दशक पूर्व से कवायद चल रही है। इस बीच प्रदेश में बसपा, सपा की सरकारें नहीं। भाजपा अभी भी सत्ता में है। केंद्र में लगातार करीब आठ वर्षों से भाजपा की सरकार है, लेकिन चित्रकूटधाम मंडल मुख्यालय में केंद्रीय विद्यालय के लिए सत्तारूढ़ दल के जनप्रतिनिधि मात्र आठ एकड़ जमीन का इंतजाम नहीं करा पाए।
मार्च 2013 में तत्कालीन डीएम ने केंद्रीय विद्यालय संगठन, वाराणसी को केंद्रीय विद्यालय खोलने का प्रस्ताव भेजा था। इस पर संगठन के प्रशासनिक अधिकारी ने डीएम को बताया था कि विद्यालय के लिए पांच एकड़ भूमि कृषि विश्वविद्यालय परिसर में प्रस्तावित की गई है। यह पर्याप्त नहीं है।
केंद्रीय विद्यालय के लिए आठ एकड़ भूमि की जरूरत है। केंद्रीय संगठन ने यह भी कहा था कि कृषि विश्वविद्यालय परिसर अस्थायी भवन उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है, मगर वह भवन मानकों पर खरा नहीं है। भवन में कम से कम सात मीटर लंबे व सात मीटर चौड़े क्षेत्रफल के 20 कमरे होने चाहिए, ताकि एक कमरे में 40 बच्चों को बैठाया जा सके।
केंद्रीय विद्यालय संगठन प्रशासन से कर रहा पत्राचार
बांदा। केंद्रीय विद्यालय संगठन के प्रशासनिक अधिकारी गौतम बनर्जी की ओर से जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत कुलदीप शुक्ल को दी गई सूचना में बताया गया था कि बांदा में केंद्रीय विद्यालय स्थापना के लिए वर्ष 2011-12 से लगातार जिला प्रशासन से पत्राचार किया जा रहा है। केंद्रीय विद्यालय में एक से पांच तक की कक्षाओं का संचालन होता है। प्रत्येक कक्षा में 40 छात्रों का नामांकन किया जाता है।
बच्चों को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा लागू भाषा व कोर्स के अनुसार शिक्षा दी जाती है। यह भी बताया कि केंद्रीय विद्यालय द्वारा छात्रों को छात्रावास या परिवहन की सुविधा प्रदान नहीं की जाती। फीस के लिए प्रति वर्ष केंद्रीय संगठन दिशा-निर्देश जारी करता है। उधर, आरटीआई एक्टिविस्ट कुलदीप शुक्ल का कहना है कि शिक्षा से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर अफसर तो लापरवाह हैं ही, स्थानीय जनप्रतिनिधि भी बेपरवाह हैं। वह चाहें तो केंद्रीय विद्यालय का संचालन अगले सत्र से ही शुरू हो सकता है।
सांसद बोले- स्थानीय स्तर पर भी लगातार प्रयास जारी
बांदा। लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान यह मुद्दा उठाने वाले बांदा-चित्रकूट के सांसद आरके सिंह पटेल का कहना है कि वह बांदा व चित्रकूट दोनों ही जनपदों में केंद्रीय विद्यालय भवन के लिए लगातार प्रयास करते रहे हैं। पिछली सरकारों में तवज्जो नहीं दी गई।
भाजपा सरकार आने पर उनके प्रयास से कृषि मंत्री ने बांदा कृषि विश्वविद्यालय में भूमि या किराये पर भवन लेकर चलाने को कहा था, लेकिन भूमि व भवन मानक पर खरा न उतरने पर प्रस्ताव खारिज कर दिया। इस पर स्थानीय अधिकारियों से उनकी बात हो रही है। इसी तरह चित्रकूट में केंद्रीय विद्यालय भवन के लिए उन्होंने कई बार जिला मुख्यालय में आयोजित निगरानी समिति की बैठक में भी यह मुद्दा उठाया है। वहां भी केंद्रीय बोर्ड ने जमीन को नापसंद कर दिया।
डीआईओएस ने डीएम के पाले में डाली गेंद
केंद्रीय विद्यालय के लिए भूमि के मुद्दे पर जिला विद्यालय निरीक्षक विनोद कुमार सिंह ने गेंद जिलाधिकारी के पाले में डाल दी। उन्होंने कहा कि भूमि जिलाधिकारी ही उपलब्ध करा सकते हैं। इसके पूर्व जिला विद्यालय निरीक्षक ने कुलदीप शुक्ल को आरटीआई के तहत बताया था कि वर्ष 2019-20 में पचनेही गांव स्थित पंडित दीनदयाल राजकीय माडल इंटर कालेज में अस्थायी रूप से केंद्रीय विद्यालय संचालित करने के लिए शासन से अनुमति मांगी थी, लेकिन यह प्राप्त नहीं हुई। इसके लिए पत्राचार किया जा रहा है। यह भी बताया कि केंद्रीय विद्यालय का अस्थायी संचालन शुरू हो जाने के बाद ही विद्यालय के लिए आरक्षित भूमि पर भवन निर्माण शुरू किया जाता है।