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बकस्वाहा जंगल में खनन पर हाईकोर्ट की रोक

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बांदा। बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल की हरियाली की तबाही फिलहाल टल गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यहां हीरा खनन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते हुए स्थगन आदेश जारी किया है। केंद्र और राज्य सरकार तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से जवाब दाखिल करने को कहा है।
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बकस्वाहा (छतरपुर, एमपी) के जंगल को हीरा खदान के लिए एमपी सरकार ने बिड़ला ग्रुप की एस्सल माइनिंग एंड इंड्रस्ट्रीज कंपनी को 50 साल के पट्टे पर दे दिया है। ऐसे में इस जंगल के करीब 2.15 लाख हरे भरे पेड़ों के कटने और यहां की चट्टानों में 25 हजार वर्ष से भी पुराने दुर्लभ शैल चित्रों के नष्ट होने के आसार पैदा हो गए हैं। पर्यावरण प्रेमी और पैरोकार पूरे देश में इसका विरोध कर रहे हैं।
नागरिक उपभोक्ता मार्ग दर्शक मंच के अध्यक्ष और पर्यावरण पैरोकार डॉ. पीजी नाजपांडे ने जुलाई में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि बकस्वाहा जंगल में पाए गए शैल चित्र (रॉक पेटिंग्स) पाषाण युग के हैं। यहां की मूर्तियां स्तंभ आदि चंदेल तथा कस्चुरी युग के हैं। यहां हीरा खनन से यह पुरातत्व संपदा नष्ट हो सकती है।
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हाईकोर्ट ने पहली अक्तूबर को याचिका पर सुनवाई के बाद जांच पूरी होने तक हीरा खनन की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। साथ ही इस पर अंतरिम आदेश के लिए 26 अक्तूबर की तिथि निर्धारित की थी। मंगलवार 26 अक्तूबर को याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता श्री नाजपांडे के अधिवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने कहा कि बकस्वाहा के रॉक पेटिंग्स मानव जीवन की जानकारी देने वाले महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। जब तक पुरातात्विक कानून 1958 के तहत पुरातत्व विभाग की कार्रवाई पूरी नहीं हो जाती तब तक खनन पर रोक लगाई जानी चाहिए।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आरवी मलिमथ और न्यायाधीश वीके शुक्ला की खंड पीठ ने बकस्वाहा जंगल में खनन पर स्थगन आदेश जारी कर दिया है। हाईकोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार और पुरातत्व विभाग को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
जंगल, जीव-जंतु और शैल चित्र मिटने का खतरा
बांदा। बुंदेलखंड के छतरपुर जिले में स्थित बकस्वाहा जंगल में हीरा खनन से लगभग 2.15 लाख पेड़ काटे जाएंगे। इतनी बड़ी संख्या में हरे पेड़ों की कटान से पर्यावरण को संभावित भारी नुकसान के मद्देनजर पर्यावरण पैरोकार संगठन देश व्यापी विरोध कर रहे हैं। एनजीटी और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी यह मामला पहुंच चुका है। बकस्वाहा जंगल में लाखों पेड़ के अलावा बड़ी संख्या में जीव-जन्तु और दुर्लभ हजारों वर्ष पुराने शैल चित्र भी हैं।
बुंदेलखंड का पर्यावरण बिगड़ेगा
बांदा। बकस्वाहा जंगल के 382.131 हेक्टेयर वन क्षेत्र में हीरा खनन की योजना है। पर्यावरण पैरोकारों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में हरे पेड़ काटे जाने से न सिर्फ बकस्वाहा का बल्कि बुंदेलखंड का पर्यावरण गड़बड़ा जाएगा। जंगल के पेड़ों में हजारों की संख्या में पक्षियों के बसेरे हैं। वह भी वीरान हो जाएंगे। पानी का भी संकट खड़ा हो जाएगा। क्योंकि हीरा परियोजना में हर साल लगभग 5.3 मिलियन क्यूबिक पानी खर्च होगा।
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