फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

वामदेव और नीलकंठ मंदिरों की मिट्टी जाएगी अयोध्या

विज्ञापन
वामदेव और नीलकंठ मंदिरों की मिट्टी और केन नदी के जल के कलश लेकर यात्रा निकालते विश्व हिंदू परिषद ? - फोटो : BANDA
विज्ञापन
बांदा। अयोध्या में 5 अगस्त को राम मंदिर के भूमि पूजन में बांदा के दो ऐतिहासिक और अति महत्वपूर्ण मंदिरों की मिट्टी और केन नदी का जल भी शामिल होगा। विश्व हिंदू परिषद ने प्रदेश के 21 जिलों के धार्मिक स्थलों की मिट्टी अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन में शामिल करने की योजना बनाई है। इसमें बांदा भी शामिल है। यह मंदिर बांदा शहर के बांबेश्वर पर्वत पर स्थित वामदेवेश्वर और ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग में स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर हैं।
विज्ञापन

विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने यहां केन नदी का जल और शहर के बांबेश्वर पहाड़ पर स्थित वामदेवेश्वर मंदिर व कालिंजर दुर्ग में स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर की रज (मिट्टी) संकलित की। चित्रकूट से पयस्वनी नदी का जल और कामतानाथ की मिट्टी तथा हनुमानधारा का जल भी संकलित किया।
इन्हें कलशों में सजाकर बुधवार को कलश यात्रा निकाली। यह कलश परिषद के कानपुर प्रांत कार्यालय जाएगी। वहां से अयोध्या भेजी जाएगी। इस अवसर पर परिषद के जिलाध्यक्ष चंद्रमोहन बेदी, मंत्री पवन सिंह, जिला संयोजक विवेक सिंह, समरसता प्रमुख विश्राम कुमार, उपाध्यक्ष हर्षवर्धन, भुवनेंद्र कुमार, नगर संयोजक देवराज, महावीर, नगर अध्यक्ष महेंद्र चौहान सहित सचिन सोनकर, देशपाल कुशवाहा, नवल कुशवाहा, अमर भगत, विमल निगम, चंद्र प्रकाश, अनिल बजरंगी, विवेक चंदेल, रिंकू सोनी आदि उपस्थित रहे।
विज्ञापन

वामदेवेश्वर मंदिर
बांबेश्वर पहाड़ पर स्थित यह शिव मंदिर रामायण कालीन माना जाता है। पहाड़ की चट्टानों के बीच करीब 5 मीटर गहरी गुफा में स्थित शिवलिंग अन्य शिव मंदिरों से अनोखा है। अन्य शिव मंदिरों में शिवलिंग के पास नंदी की मूर्ति होती है, लेकिन इसमें नहीं है। किवदंती है कि यह शिवलिंग महर्षि वामदेव की तपस्या से उत्पन्न हुआ।
वामदेव ऋषि यहां तपस्या करते थे। यह भी माना जाता है कि वनवास में चित्रकूट जाते समय श्रीराम और लक्ष्मण ने ऋषि वामदेव का आशीर्वाद लिया था और शिवलिंग की पूजा की थी। यहां के पुजारी पुत्तन तिवारी के मुताबिक रामायण काल में इस शिवलिंग का वर्णन है। महर्षि वामदेव को पंचमुखी भगवान शिव का तीसरा मुख कहा गया है।
नीलकंठ महादेव मंदिर, कालिंजर
मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर दूर कालिंजर गांव के पर्वत पर ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग है। यह पुरातत्व महत्व और पर्यटक स्थल है। इसी दुर्ग के पश्चिम भाग में नीलकंठ महादेव का अति प्राचीन मंदिर है। वास्तु शिल्प की दृष्टि से यह चंदेल शासकों की अनोखी कृति है। मंदिर के ऊपर प्राकृतिक जलस्रोत है।
इससे शिवलिंग का अभिषेक निरंतर होता रहता है। किवदंती है कि समुद्र मंथन के समय शिवजी को विषपान करने के बाद यहीं शांति मिली थी। यहां निवास कर रहीं काली माता यह स्थान छोड़कर कोलकाता चली गई थीं। कालिंजर को शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा पर यहां हर वर्ष मेला लगता है।
पूजन को भेजी जाएगी जालौन की मिट्टी
उरई। राम मंदिर में जालौन के धार्मिक स्थलों की माटी भी लगाई जाएगी। यह धार्मिक स्थल हैं कुठौंद का जालौनी माता का मंदिर, उरई के जेल रोड स्थित ठड़ेश्वरी मंदिर, कोंच का दोहर हनुमान मंदिर और जगम्मनपुर स्थित पचनद का मंदिर, इन सभी माटी के साथ ही राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा। विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष भास्कर अवस्थी ने बताया कि गुरुवार को इन चारों धार्मिक स्थलों की माटी एकत्र की जाएगी।

कालिंजर दुर्ग में स्थित नीलकंठेश्वर।- फोटो : BANDA

वामदेवेश्वर मंदिर।- फोटो : BANDA

वामदेवेश्व मंदिर गुफा में स्थापित शिवलिंग।- फोटो : BANDA

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें