बलरामपुर। नई मतदाता सूची ने जिले की सियासत को पूरी तरह हिला दिया है। एसआईआर के बाद हजारों मतदाताओं के नाम कटने और बड़ी संख्या में नए वोटरों के जुड़ने से अब तक सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों का गणित भी उलट गया है। हालात ऐसे हैं कि जिन सीटों पर जीत का अंतर हजारों में था, वहां अब कटे हुए वोट उस अंतर से कई गुना ज्यादा हैं। इस बार मुकाबला पूरी तरह नए सिरे से शुरू माना जा रहा है।
सबसे बड़ा असर सदर विधानसभा पर दिख रहा है। वर्ष 2022 में भाजपा के पल्टूराम ने 10,971 मतों से जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार 87,850 मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं। यह आंकड़ा बताता है कि पिछले चुनाव की बढ़त अब किसी भी मायने में ‘सुरक्षित’ नहीं रही।
उतरौला सीट का गणित भी पूरी तरह बदल चुका है। यहां 2022 में 21,769 मतों से जीत दर्ज हुई थी, लेकिन अब 86,576 वोट कट गए हैं। यानी यहां भी जीत का पुराना अंतर नए समीकरण के सामने बेहद छोटा पड़ गया है।
तुलसीपुर में भी स्थिति कम चौंकाने वाली नहीं है। 35,781 मतों की जीत के मुकाबले 51,999 वोट कटे हैं। यह अंतर साफ संकेत देता है कि यहां चुनावी दिशा पूरी तरह बदल सकती है।
गैसड़ी सीट, जहां हाल ही में उपचुनाव हुआ था, वहां 9,437 मतों की जीत के मुकाबले 45,847 वोट कटने से सियासी चिंता बढ़ गई है। यहां भी कोई भी दल पुरानी बढ़त के भरोसे नहीं रह सकता। फिलहाल सभी दल मतदाताओं की स्थिति का आकलन कर अभी से तैयारी कर रहे हैं। भाजपा ने भी मंडल स्तर के पदाधिकारियों को क्षेत्र में जुटाने का खाका खींचा हैं, वहीं सपा, कांग्रेस और बसपा भी तैयारी में जुटे हैं। - संवाद
पुरानी जीत अब बेअसर, युवाओं की एंट्री से बदली दिशा
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जब कटे वोट जीत के अंतर से कई गुना ज्यादा हों, तो पुराना जनादेश लगभग निष्प्रभावी हो जाता है। इसका सीधा मतलब है कि इस बार चुनाव ‘नई जमीन’ पर लड़ा जाएगा, जहां हर वोट की कीमत पहले से ज्यादा होगी।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. एसके मिश्र कहते हैं कि कटे हुए वोटों के साथ बड़ी संख्या में नए, खासकर युवा मतदाता जुड़े हैं। ये मतदाता जातीय और पारंपरिक निष्ठाओं से हटकर मुद्दों रोजगार, शिक्षा, सुविधाओं और विकास पर वोट करने की प्रवृत्ति रखते हैं। इससे राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी है।
बदलती सियासत का संकेत, हर सीट पर बढ़ा जोखिम
अब कोई भी सीट पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा सकती। जिन उम्मीदवारों ने पिछली बार आरामदायक जीत दर्ज की थी, उन्हें भी इस बार नए सिरे से जमीन पर मेहनत करनी होगी। बूथ स्तर पर सक्रियता, मतदाता संपर्क और स्थानीय मुद्दों पर पकड़ ही जीत का रास्ता तय करेगी।
नई मतदाता सूची ने साफ कर दिया है कि बलरामपुर की सियासत अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगी। यह चुनाव केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि पुराने और नए वोटरों की सोच के बीच भी होगा। पूर्व निर्वाचन अधिकारी आरसी शर्मा ने बताया कि कटे वोटों से जीत-हार का पूरा गणित बदल दिया है। अब जो दल इस बदलाव को समझकर नई रणनीति बनाएगा, वही चुनावी बाजी अपने नाम कर सकेगा।