बलिया। जिले के परिवहन सुविधाओं की बात करें तो जनपद अब भी पड़ोसी जनपदों से काफी पीछे हैं। पड़ोस के आजमगढ़, मऊ और गाजीपुर को पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के साथ ही कई हाईवे की सुविधाएं मिल चुकी हैं। लेकिन जनपद के लिए एक्सप्रेस-वे, हाईवे, बाईपास और रिंगरोड की बात करें तो अभी सब कागजों में सिमटा हुआ है। ऐसे में परिवहन की रफ्तार बेहतर तो हरर्गिज नहीं कही जा सकती है। इसके कारण शहर को रोजाना जाम की समस्या से जूझना पड़ता है।
पूर्वांचल के जनपदों में विकास को रफ्तार देने के लिए शासन की ओर से कई एक्सप्रेस-वे और हाईवे की सौगातें दी गई। लेकिन जनपद बलिया इसमें पीछे छूट गया है। राज्य मुख्यालय लखनऊ और वहां से दिल्ली तक की बेहतर कनेक्टिविटी के लिए शासन की ओर से पूर्वांचल एक्सप्रसे-वे बनाया गया। ये एक्सप्रेस वे विभिन्न जनपदों से होते हुए आजमगढ़, मऊ होते हुए गाजीपुर के हैदरिया में खत्म हो गया। बलिया इससे छूट गया। इसको लेकर काफी मांगें उठी तो लिंक एक्सप्रेस-वे से इसे पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे से जोड़ने की बात कही गई। यूपीडा की ओर से सर्वे भी कराया गया। कुछ गांवों की सूची भी जारी की गई, लेकिन सर्वे करने वाली कंपनी ने इसमें उसी रूट को शामिल कर दिया जिस रूट से ग्रीन फील्ड एक्सप्रेस-वे निकलने वाला है। नतीजा ये हुआ कि अब इसका फिर से सर्वे कराया जा रहा है। पहले इसे यूपीडा की ओर से बनाया जाना था। अब एनएचएआई बनाएगी। अभी सारी प्रक्रिया कागजों में ही है।
नहीं शुरू हो पाई ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे के लिए भूमि खरीद
बलिया। जिले को करीब सात माह पहले ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे फोरलेन की सड़क की सौगात मिली। अभी तक अधिसूचना जारी होने के महीनों बाद भी जमीन खरीद की प्रक्रिया शुरु नहीं हो सकी है। गाजीपुर से मांझी तक बनने वाला ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे का पांच हजार करोड़ रुपये की लागत से निर्माण होना है। यह एनएच-31 से हटकर नए सिरे से बनाई जाएगी। फोरलेन का एक्सप्रेस-वे गाजीपुर के पास गोरखपुर-वाराणसी एनएच-29 से कनेक्ट होकर मांझीघाट पुल से जुड़ेगा। मांझी घाट में जयप्रभा सेतु से सटा कर टू लेन का एक और पुल बनेगा। दावा किया गया था कि मार्च 2022 से पूर्व भूमि अधिग्रहण का कार्य पूरा करने के बाद टेंडर की प्रक्रिया भी पूरा कर लेंगे। अप्रैल 2022 से निर्माण कार्य शुरू होगा। तीन वर्ष में निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा। अभी तक जमीनों खरीद की प्रक्रिया ही शुरू नहीं हो सकी है।
न बाईपास और न ही रिंग रोड
बलिया। शहर को जाम से बचाने के लिए ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे का बाईपास बनाने की बात भी कही गई थी। बैरिया के लिए लिंक बनना था। मौजूदा एनएच-31 को स्टेट के हवाले करना था। बाईपास की व्यवस्था नहीं होने से शहर में रोजाना जाम लगना आम बात है। ये शहर के लिए लाइलाज बीमारी बन चुकी है। वहीं, रिंग रोड नहीं होने से बाहरी जनपदों से आने वाले भारी वाहन सीधे शहर में आते है। इससे जाम की समस्या होती है। भारी वाहनों से अन्य मार्गों से निकलने से वो भी खस्ताहाल हो जा रहा है। उन सड़कों की क्षमता भारी वाहनों लायक नहीं बनाई गई है। शहर में मात्र एक फ्लाईओवर है, लेकिन इसका भी निर्माण ऐसे हुआ है कि इसका खास प्रयोग नहीं हो पाता है।
सात वर्षों से एनएच-31 पर खा रहे हिचकोले
बलिया। शहर से गुजरने वाली एनएच-31 पिछले सात वर्षों से ये बदहाल हालत में है। बातें और घोषणाएं तो बहुत हुईं, लेकिन नागरिक इस पर हिचकोले खाने को विवश रहे। जिले में कोटवां नारायनपुर से लेकर मांझी घाट तक करीब 90 किमी लंबी सड़क 90 से सौ फीसदी तक ध्वस्त है। हालांकि एक बार फिर इसकी मरम्मत के लिए टेंडर हो चुका है। एनएचएआई ने 117 करोड़ का कार्य तीन कार्यदायंी संस्थाओं को आवंटित किया है। सस्थाएं सर्वे का कार्य कर रही हैं। अब देखना है कि कब तक लोगों को खस्ताहाल एनएच से मुक्ति मिलती है।
पड़ोसी जिलों के मिले ये एक्सप्रेस-वे और हाईवे
आजमगढ़-पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे, एनएच-233।
मऊ-पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, एनएच-29, आजमगढ़-मऊ स्टेट हाईवे।
गाजीपुर-पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, एनएच-29, एनएच-124सी