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देवी दर्शन के लिए उमड़े भक्त

Fri, 08 Apr 2016 08:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,बलिया
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नवरात्रि का महत्व - फोटो : gettyimages
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वासंतिक नवरात्र के शुरू होते ही शुक्रवार की भोर से ही देवी मंदिरों सहित अन्य प्रमुख मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। मां का दर्शन-पूजन करने के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं। इस मौके पर देवी भक्तों के जयकारे से मंदिर परिसर के आसपास का माहौल देवी मय बना रहा।
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मंदिरों पर सुरक्षा-व्यवस्था के मद्देनजर पुलिस बल तैनात रहा। जबकि देवी भक्त अपने-अपने घरों में कलश वैदिक मंत्रोचार के साथ कलश स्थापित कर मां का पूजन-अर्चन किए।
नवरात्र के पहले दिन शुक्रवार को सुबह से जनपद के प्रमुख देवी मंदिरों पर पहुंच भक्त मत्था टेकने और आशीर्वाद लेने में जुटे रहे। उधर भक्तों की सुरक्षा के मद्देनजर पर्याप्त संख्या में पुलिस तैनात रही।
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प्रमुख मंदिरों में जिला मुख्यालय से सटे अति प्राचीन मां ब्रह्माणी देवी मंदिर, गाजीपुर और बक्सर के सीमा पर कोरंटाडीह के पास स्थित मां मंगला भवानी मंदिर, अन्नपूूर्णा मंदिर तथा दुर्गा मंदिर, सुरही स्थित दुर्गा तथा काली जी का मंदिर,

संवरा के उचेड़ा स्थित चंडी देवी, शंकरपुर स्थित शांकरी देवी, बेल्थरारोड में भागेश्वरी-परमेश्वरी, कपूरी स्थित कपिलेश्वरी देवी, सिकंदरपुर के खरीद स्थित मां देवी के मंदिर, जिला मुख्यालय स्थित मां देवी सहित अन्य मंदिर शामिल है।

इन मंदिरों पर सुबह से ही भक्त पहुंचकर देवी मां का पूजन-अर्चन शुरू कर दिया। इस दौरान भक्तों के जयकारे और घंटी-घडिय़ाल बजने से मंदिरों के आसपास का माहौल भक्ति मय रहा। वहीं घर-घर में वैदिक मंत्रोचार के साथ कलश स्थापित कर मां का पूजन-अर्चन शुरू किया गया। वैसे शारदीय नवरात्र की अपेक्षा वासंतिक नवरात्र में देवी मंदिरों पर भक्तों की भीड़ में कमी देखने को मिली।  

जिला मुख्यालय से करीब आठ किमी. की दूरी पर स्थित ब्रह्मइन गांव में मां ब्राह्मणी देवी का प्राचीन मंदिर है, जो सदियों से श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। इस मंदिर पर हमेशा मां के भक्तों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन वासंतिक एवं शारदीय नवरात्र में दर्शन-पूजन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं। मान्यता है कि मां के दरबार में माथा टेकने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।


हनुमानगंज विकास खंड के ब्रह्माईन गांव स्थित मां ब्राह्मणी मंदिर हजारों साल पुराना है। दुर्गा सप्तशती में उल्लेख है कि राजा सूरथ अपने सैनिकों के साथ युद्ध लड़कर वापस जा रहे थे। इसी बीच उनको प्यास लगी। प्यास बुझाने के लिए उन्होंने अपने सैनिकों से पानी लाने को कहा।

सैनिक काफी तलाश के बाद घने जंगल में स्थित एक सरोवर से पानी लाए। राजा इस पानी से जैसे ही अपना हाथ धोया, वैसे ही उनके घाव सूखने लगे। उन्होंने सैनिकों से सरोवर के संबंध में जानकारी लेकर सरोवर के पास पहुंचकर डूबकी लगा लिया।

इसके बाद युद्ध में लगे घाव ठीक हो गए। इसके बाद वहां तीन सालों तक मां की आराधना की। प्रश्र होकर मां ने मनोकामना पूर्ण होने का आदेश दिया था। मान्यता है कि जिस सरोवर में राजा सूरथ और वैश्य ने स्नान किया वह आज का सूरहा ताल है और जिस देवी की आराधना दोनोें ने की वही ब्रह्माइन स्थित मां ब्रह्माणी है।
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