शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा...भले ही अशफाकउल्ला खान की ये पंक्तियां शहीदों की शान में चार चांद लगाते हों, लेकिन बलिया के लिए तो ये एक दम बेमाने हैं।
सरकार उपेक्षा का आलम ये रहा कि 1857 की क्रांति के महानायक मंगल पांडेय के गांव में उनकी शहादत दिवस पर न तो कोई मेला लगा और न ही कोई निशां देखने को मिला कि इसी मिट्टी में जन्मे सपूत ने देश को स्वतंत्रता की राह दिखाई। शुक्रवार को उनके गांव में न कोई जनप्रतिनिधि आया और न ही शासन व प्रशासन का कोई नुमाइंदा।
आजादी के 69 साल के बाद भी सरकारों और प्रशासन ने शहीद के गांव को ठेंगा दिखाया है। शहीद के पैतृक गांव नगवां की तो इस कदर उपेक्षा की गई है कि वहां तक जाने के लिए आपको न जाने कितने हिचकोले खाने पड़ेंगे, क्योंकि प्रशासन अब तक गांव जाने के लिए एक पक्की सड़क मुहैय्या नहीं करा पाया।
अगर बात करें बिजली की तो उसके रहने पर भी कई घर अंधेरे में रहते हैं। क्योंकि पूरे गांव का अबतक विद्युतीकरण नहीं हो सका है। गांव में पानी निकासी तक का साधन नहीं है। गंगा के तट पर बसे इस गांव को हमेशा बाढ़ का खतरा सताता रहता है। लेकिन इसका आज तक स्थायी समाधान नहीं ढूंढा जा सका।
गांव में शहीद की याद में एक इंटर कॉलेज की स्थापना जरूर की गई थी, लेकिन शासन द्वारा वह भी उपेक्षित है। लंबी जद्दोजहद के बाद एक स्मारक स्थल का निर्माण हुआ, जहां शहीद को याद करने के लिए मंगल पांडेय की प्रतिमा तो स्थापित की गई,
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे शहीद के गांव नगवां को शहीद गांव होने का अभिमान हो सके। गांव में न तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है और न ही बच्चों के लिए खेल का मैदान।
शहीद के परिवार के किसी भी सदस्य को प्रदेश तथा केंद्र सरकार ने नौकरी तक नहीं दी है। मंगल पांडेय की याद में तत्कालीन बसपा सरकार ने जिला मुख्यालय पर सरकारी खर्चे से दो साल तक मंगल महोत्सव का आयोजन किया।
लेकिन फिर यह आयोजन बंद कर दिया गया। वर्तमान में जिला प्रशासन मंगल पांडेय के शहादत दिवस अथवा अन्य किसी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेता। प्रथम शहीद मंगल पांडेय के परिवार में तेतरी देवी उनके पुत्र अनिल पांडेय तथा बहू और अनिल का एक पुत्र गांव पर रहते हैं। परिवार के बाकी सदस्य नैनीताल में बसे हुए हैं। तेतरी देवी का परिवार एकमात्र खेती पर ही आश्रित है।