दुबहर ब्लॉक के ओझवलिया गांव में पं अनमोल द्विवेदी के पुत्र व्योमकेश द्विवेदी कर जन्म 19 अगस्त 1907 को हुआ। जन्म के पश्चात ही इनके नाना जो जिले के बभनवली निवासी देवनारायण पांडेय ने एक कठिन एवं लम्बा अभियोग जीतकर विजय स्वरूप हजार रुपये प्राप्त किया जो अपने नाती को दे दिए। इस उल्लास में व्योमकेश हजारी प्रसाद हो गए जो अपने युग में हिंदी के प्रकांड विद्वान के रूप में प्रसिद्ध हुए।
डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी की शिक्षा-दीक्षा ग्रामीण विद्यालय रेपुरा से प्राइमरी एवं मिडिल की परीक्षा बसरिकापुर से उत्तीर्ण करने के बाद अपने चचेरे भाई विश्वनाथ द्विवेदी के साथ अपने पिता के पास पश्चिम बंगाल के फरीदपुर जिले में बरहमगंज स्थित एक निजी विद्यालय में दोनों भाइयों ने दाखिला लिया, जिसका माध्यम बंगला भाषा थी। कक्षा सात उत्तीर्ण हुए दोनों बालकों को बंगला भाषा का ज्ञान न होने से वहां तीसरी कक्षा में प्रवेश मिला। दोनों ने घोर परिश्रम कर बंगला भाषा का ज्ञान प्राप्त किया जिससे प्रधानाचार्य ने शीघ्र ही कक्षोन्नति कर इन्हें कक्षा छह में प्रवेश दे दिया। वर्ष 1921 में महात्मा गांधी ने स्कूल छोड़ो आंदोलन छेड़ दिया जिसके कारण विद्यालय बंद हो गया जिससे दोनों भाई गांव आ गए।
वहां से उच्च शिक्षा ग्रहण करने पंडित जी 1921 में ही काशी जाकर हिंदू विश्व विद्यालय में ज्योतिष में प्रवेश लिया। मालवीय जी के सान्निध्य में अत्यंत उच्च श्रेणी के परिक्षार्थी के रूप में 1929 में हजारी प्रसार द्विवेदी परीक्षा में सर्व प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। परीक्षा उत्तीर्ण कर जब मालवीय जी से आशीर्वाद लेने गए तो इनकी अलौकिक प्रतिभा का मूल्यांकन करके वे बोले-तुम हिन्दी के बहुत अच्छे विद्वान हो। रविन्द्रनाथ ठाकुर ने एक हिंदी अध्यापक मांगा है, उन्हें पत्र लिख देता हूं, चले जाओ। इस प्रकार मालवीय जी के माध्यम से हजारी प्रसाद प्रारंभ में ही उस धरातल पर पहुंचे जहां से उनकी कीर्ति पताका गगन में फहराने लगा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी के शीर्षस्थ साहित्यकारों में रहे। वे उच्चकोटि के निबन्धकार, उपन्यासकार, आलोचक, चिन्तक तथा शोधकर्ता रहे।
विश्वभारती आदि के द्वारा द्विवेदी जी ने संपादन के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता प्राप्त की । वाणभट्ट की आत्मकथा के साथ ही पुनर्नवा, चारूचन्द्रलेख, अनामदास का पोथा, जैसे ऐतिहासिक उपन्यास रहे। आचार्य जी कई वर्षों तक काशी नागरी प्रचारिणी सभा के उपसभापति, खोज विभाग के निदेशक तथा नागरी प्रचारिणी सभा के संपादक रहे। 1950 में बीएचयू में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर रहे। 1955 में वे प्रथम आफिशियल लैंग्वेज कमीशन के सदस्य चुने गए।
1957 में पद्मभूषण से सम्मानित हुए
उनको साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में महामहिम राष्ट्रपति द्वारा 1957 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1958 में वे नेशनल बुक ट्रस्ट के सदस्य रहे। 1960 में पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और प्रोफेसर होकर चंडीगढ़ चले गए। 1968 में फिर बीएचयू में डायरेक्टर नियुक्त हुए। इसके बाद उत्तर प्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के अध्यक्ष हुए और फिर 19 मई 1979 में महानिर्वाण को प्राप्त हुए।
हजारी प्रसाद के नाम से बने प्रवेश द्वार को ध्वस्त करा दिया
बलिया के अद्वितीय लाल पद्मभूषण आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आज अपने ही जनपद में बेगाने होते जा रहे हैं। पंडित जी के गांव ओझवलिया को उनकी गरिमा एवं सम्मान के अनुरूप समग्र विकास करवाना चाहिए था लेकिन विकास तो दूर द्विवेदी जी के नाम पर न तो एक पुस्तकालय है और ना ही एक आदमकद मूर्ति की स्थापना ही हुई। हद तो तब हो गई जब दो सितंबर 2020 को एनएच-31 पर पूर्व में निर्मित आखिरी निशानी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी स्मृति प्रवेश द्वार को नजदीकी ईंट भट्टा के मालिक ने साजिश के तहत जेसीबी से गेट का नींव खोदवाकर उसे ध्वस्त करवा दिया जिसके खिलाफ ग्राम प्रधान द्वारा दुबहर थाने में तहरीर दी गई लेकिन 10 माह बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। - सुशील कुमार द्विवेदी, प्रबंधक, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी स्मारक समिति
हिंदी के शीर्षस्थ साहित्यकार एवं कालजयी रचनाकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्मभूमि ओझवलिया आज अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहा रहा है। जिले के प्रथम सांसद आदर्श गांव के रुप में चयन के पश्चात लोगों को कुछ उम्मीदें बंधी थी लेकिन वो भी छलावा साबित हुई। जिले के जनप्रतिनिधि एवं जिम्मेदार अधिकारी कभी भी आचार्य जी केे पैतृक गांव की सुधि नहीं लेते।
- आचार्य पं. श्रीशचन्द्र पाठक, वरिष्ठ साहित्यकार, ओझवलिया।