बलिया। देश भले ही 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ लेकिन बलिया पांच साल पहले 1942 में ही आजाद हो गया था। हालांकि यह आजादी महज 13 दिनों तक ही रही लेकिन जिले के आजादी की दीवानों ने ब्रिटिश हुकूमत के छक्के छुड़ा दिए थे।
नौ अगस्त को शुरू हुई क्रांति ज्वाला धधकने लगी थी। आंदोलनकारी बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। मुंबई में महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल को को पकड़ कर आगा खां महल में नजरबंद किया गया था। इसकी जानकारी होने पर 10 अगस्त को भोर में ही लोग घरों से लालटेन लेकर निकल पड़े। जगह-जगह युवकों ने महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में शहर बंद रखने और जुलूस निकालने की घोषणा की। करीब आठ बजे ओक्डेनगंज चौराहा पर उमाशंकर ने भाषण दिया। इसके बाद शहर में जुलूस निकालने और हड़ताल का ऐलान किया गया। इनके सहयोग में सूरज प्रसाद, अवध किशोर प्रसाद आदि भी थे। चौराहा से जुलूस जब रेलवे स्टेशन पहुंचा तो एक ट्रेन आ गई जिससे उतरे छात्र भी जुलूस में शामिल हो गए। आलम यह रहा कि जुलूस चलता गया और लोगों की तादाद बढ़ती गई। गौरीशंकर राय, योगेन्द्र मिश्र, वासुदेव राय की अगुवाई में विभिन्न छात्रावासों के छात्र भी जुलूस में शामिल हो गए। जुलूस जब मालगोदाम पहुंचा तो कम्युनिस्ट नेता विश्वनाथ मर्दाना की ललकार पर मालगोदाम पर काम करने वाले मजदूर भी जुलूस में शामिल हो गए। कचहरी जाकर जुलूस समाप्त हो गया। आजादी के दीवानों ने ताकत दिखाकर ब्रिटिश सिपाहियों को बैकफुट पर कर दिया।