पूर्वांचल की साख और जनपद का धरोहर नंदीग्राम पशु मेला आज अपने वजूद पर आंसू बहा रहा है। इसकी वजह नगर पालिका और जिला प्रशासन की घोर उदासीनता है। वर्ष 2000 में मेला 113 से 120 एकड़ भूमि पर लगता था, गैर प्रांत के पशु व्यापारी यहां आकर व्यापार करते थे। लेकिन वक्त की मार कह लें तो आज मेला महज 70 एकड़ में सिमट कर रह गया है। मेला क्षेत्र में जिस तरह प्लाटिंग का कार्य चल रहा है, उससे वह दिन भी दूर नहीं जब मेला सिर्फ सीमित क्षेत्र में ही सिमट कर रह जाएगा।
महर्षि भृगु मुनि की तपोस्थली पर लगने वाले नंदीग्राम पशु मेले में कभी पंजाब, बंगाल, असम, ओड़िसा, मध्यप्रदेश के व्यापारी आकर व्यापार करते थे। लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियां व्यापारियों की प्रतिकूल होती गई। जिससे इस मेले की रौनक फीकी पड़ने लगी। गौर करने वाली बात यह है कि वर्ष 2000 में 113 एकड़ में पशु मेला लगाया गया था।
इसके बाद वर्ष 2004 में 96 एकड़ में आकर सिमट गया। वर्ष 2008 में 90 एकड़। वहीं 2011 में 86 एकड़ में आकर सिमट गया। 2013 आते-आते मेले का क्षेत्र 75 एकड़ तक हो गया। लेकिन इस साल यह और घटकर महज 70 एकड़ में सिमट गया। इस प्रकार देखा जाय तो पिछले डेढ़ दशक में 43 एकड़ मेले के क्षेत्रफल में कमी दर्ज की गई है। सब कुछ जाने के बाद भी जिला प्रशासन इसे लेकर बहुत गंभीर नहीं है। अब पशु मेले में पहले जैसी रौनक नहीं दिखती है। किसी प्रकार बस औपचारिकताएं जिला प्रशासन द्वारा पूरी की जा रही है।