लखनऊ। ‘सावन का महीना पवन करे सोर, जियरा रे झूमे ऐसे जैसे वन मा नाचे मोर’ मिलन फिल्म का यह गीत सावन के महीने में जब सुनाई पड़ता है तो आज भी लोगों का मन प्रफुल्लित हो जाता है।
सावन में रिमझिम बरसात और ठंडी हवाओं के बीच घरों के आसपास व बागों में झूला डालकर लंबे-लंबे पैग बढ़ाते हुए सावनी गीत और कजरी गाने में जो आनंद मिलता है, उसका वर्णन अत्यंत ही मनोहारी है। लेकिन वक्त बदलने के साथ ही आज त्योहारों की परंपराएं भी रस्म अदायगी तक ही सीमित हो गई हैं। अब सावन में गांवों में घरों के आसपास और बागों में झूले पर मस्ती करते बच्चे, युवक और युवतियां बहुत कम ही नजर आते हैं।
पहले सावन का महीना शुरू होते ही गांवों में घरों के आसपास और बगीचों में झूले पड़ जाते थे। इन झूलों पर शाम को रिमझिम बारिश और ठंडी हवाओं के बीच बच्चे, युवक व युवतियां खूब मस्ती करते थे।
युवतियां समूह में एकत्र होकर एक-दूसरे से चुहलबाजी करते हुए झूले पर लंबे-लंबे पैग बढ़ाकर सावन की बरसे बदरिया घिर आई अंधिरिया, कैसे खेले जाइब सावन में कजरिया, बदरिया घिर आई ननदी और बदरी बाबुल के अंगना जइयो... गाती थीं तो इन्हें सुनकर अन्य लोगों का मन भी सावन की मस्ती में डूब जाता था।
गांव की बुजुर्ग महिलाएं भी युवक व युवतियों के साथ सावनी गीत और कजरी गाकर आनंद लेती थीं। गांव के किसान भी अपनी लहलहाती फसलों को देखकर खूब मल्हारें गाते थे। शाम को चौपालों पर एकत्र होकर ग्रामीण एक-दूसरे से हंसी ठिठोली करते हुए जब कजरी और मल्हारें गाते थे तो उन्हें सुनकर अन्य लोग भी वहां जाने से खुद को रोक नहीं पाते थे।
चारो तरफ सावन की मस्ती का माहौल होता था। लेकिन अब ऐसा माहौल दिखाई नहीं पड़ता है। वक्त बदलने के साथ ही भागदौड़ भरी जिंदगी में तीज त्योहार की परंपराएं भी अब सिमटती जा रही हैं। अब गांवों में न तो कहीं झूले पड़े नजर आते हैं और न ही मस्ती करते हुए युवक और युवतियाें की टोलियां ही दिखाई पड़ती हैं।
नानपारा के स्टेशन रोड निवासी मंजू अग्रवाल ने कहा कि अब पुरानी यादों में ही झूले बचे हैं। आधुनिक झूलों के बाजार में आ जाने से घर में ही झूले लग जाते हैं। पुरानी बाजार निवासी सुमनलता गुप्ता ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में घर की लड़कियों को बाहर नहीं निकलने दिया जाता। ऐसे में सावन में झूले पड़े दिखाई नहीं देते।
जुबलीगंज निवासी आशा पोद्यार ने बताया कि छोटी उम्र में झूलों के प्रति चाहत भी होती थी और सभी समूह में एकत्र भी हो जाती थीं। लेकिन आज के समय में यह परंपरा पूरी तरह से समाप्त होती जा रही है। पयागपुर के भूपगंज बाजार निवासी किरन अग्रवाल ने कहा कि सावन के महीने में हम सभी पहले घरों के सामने झूले डालकर मस्ती करती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है।
सुहेलवा निवासी आशा देवी ने बताया कि पहले घर में पिता व भाई झूले डाल देते थे, जिन पर हम सभी जमकर मस्ती करते थी। मिहींपुरवा के बाजपुर बनकटी निवासी कालिंदी पांडेय ने बताया कि समय परिवर्तन के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी झूलों का महत्व खत्म होता जा रहा है। सावन और कजरी के गीत अब कहीं भी सुनाई नहीं देते हैं। लड़कियों के बीच भी मोबाइल और हाईटेक गेम के आने से झूलों के प्रति उत्सुकता खत्म हो रही है। अब तो यादों में ही झूले बचे हैं।