बाबागंज (बहराइच)। साधन सहकारी समिति बाबागंज में यूरिया के लिए सोमवार सुबह पांच बजे से किसानों की कतार लग ई। जब समिति का ताला खुला, तो पता चला कि मात्र 256 बोरी यूरिया ही मौजूद है, जबकि ढाई हजार किसान कतार में खड़े हैं। यूरिया की अगली खेप कब आएगी, इसकी जानकारी समिति के अधिकारियों को भी नहीं हैं।
रुपईडीहा क्षेत्र के साधन सहकारी समितियों पर यूरिया उपलब्ध नहीं है। सोमवार को सुबह पांच बजे से ही किसान केंद्र पर लाइन लगाकर खड़े हो गए। दस बजे जब समिति का ताला खुला तो एक ही घंटे में यूरिया समाप्त हो गई। खाद की आस में लाइन लगाए खड़े किसान दिवाकर पांडेय, पूजा सिंह, छोटेलाल, देवीदयाल, सुनीता, रामानंद वर्मा व अशोक कुमार वर्मा ने बताया कि पूरे दिन यूरिया के लिए खतौनी व आधार लेकर भटक रहे हैं।
किसान मंजू देवी, आशा व राजरानी का कहना है कि पांच दिन से वह यूरिया के लिए भटक रही हैं। किसान रामनरेश का कहना रहा कि प्रशासन केवल यूरिया उपलब्ध होने का दावा कर रहा है, लेकिन मौके की स्थिति अलग है। समिति के प्रभारी सचिव महेश सिंह ने बताया कि 256 बोरी यूरिया उपलब्ध थी, पांच सौ बोरी की डिमांड की गई है। मिलते ही वितरण होगा।
भीड़ देख सचिव खिसके, गुस्साए किसानों ने किया प्रदर्शन
मिहींपुरवा। यूरिया की किल्लत ने किसानों की बेचैनी बढ़ा दी है। सोमवार तड़के करीब तीन बजे से ही कस्बे के बहुउद्देशीय किसान सेवा सहकारी समिति परिसर में हजारों किसान जुट गए। मिहींपुरवा–कतर्नियाघाट हाईवे पर जाम जैसी स्थिति बन गई। भीड़ का दबाव देख समिति के कर्मचारी मौके से खिसक गए। नाराज किसानों ने सड़क पर प्रदर्शन भी किया। पुलिस ने हालात संभालने की कोशिश करती रही, लेकिन भीड़ टस से मस नहीं हुई। उपजिलाधिकारी मिहींपुरवा प्रकाश सिंह ने बताया कि नायब तहसीलदार, राजस्व टीम और पुलिस को मौके पर भेजा गया। सचिव अनुपस्थित पाए गए। किसानों को समझाकर बताया गया है कि यूरिया का वितरण मंगलवार को कराया जाएगा।
खतौनी में नाम नहीं, तो बैरंग लौटे किसान
मटेरा। असवा मोहम्मदपुर में बनी समिति पर सोमवार भोर चार बजे से ही किसान यूरिया के लिए लाइन में खड़े हो गए। लालपुर शिवपुर के समिति पर भी किसानों की भारी भीड़ रही। सचिव आधी-अधूरी खाद बांटकर समिति बंद करके खिसक गए। बरगदिहा निवासी इंदल कुमार ने बताया कि सुबह पांच बचे से लाइन में लगा था, अब समिति के सचिव ने बताया कि जिसके नाम खतौनी में दर्ज है उसी को खाद मिलेगी। यही हाल अन्य किसानों का रहा, खतौनी में नाम दर्ज न होने के चलते सभी की खाली हाथ लौटना पड़ा।