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माताओं में कुपोषण का असर, 415 नवजात जन्म लेते ही मरे

Tue, 14 Jul 2015 09:51 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
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बहराइच। शिशु मृत्यु दर पर अंकुश लगाने के तमाम दावे फेल साबित हो रहे हैं। बहराइच में जन्म लेने के बाद 415 नवजातों को मां की गोद नहीं बल्कि मौत की गोद नसीब हुई है।
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छह महीने के इन आंकड़ों का खुलासा स्वास्थ्य महकमे की स्टिल बर्थ रिपोर्ट से हुआ है। रिपोर्ट में नवजात शिशुओं की मौत के कारण स्पष्ट नहीं है, लेकिन माताओं का कुपोषण एक सामान्य और मुख्य वजह मानी जा रही है।

अब देखना ये है कि इस खुलासे के बाद स्वास्थ्य महकमा कुपोषण खत्म करने के लिए क्या कदम उठाता है।

राज्य पोषण मिशन के अंतर्गत जिले के 14 विकासखंडों में प्रत्येक ब्लॉक के पांच-पांच गांवों को अधिकारियों ने गोद लिया है। इसके अलावा जननी सुरक्षा योजना, जननी शिशु सुरक्षा योजना संचालित है।
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वहीं, बाल विकास विभाग द्वारा पुष्टाहार भी बांटा जा रहा है ताकि शिशु व मातृ मृत्युदर पर प्रभावी रोकथाम लग सके। जिला अस्पताल में जनवरी 2015 से जून तक 10 हजार 864 गर्भवती महिलाओं की जांच हुई।

इनमें तीन हजार 642 महिलाओं के सामान्य प्रसव हुए हैं। जबकि 787 महिलाओं के सीजेरियन प्रसव किए गए हैं। इस दौरान 415 नवजात प्रसव के दौरान या कुछ समय अंतराल पर मौत की नींद सो गए।

रिपोर्ट में इन बच्चों की मौत के कारण स्पष्ट नहीं किए गए हैं लेकिन डॉक्टरों की मानें तो मौत की सामान्य वजह कुपोषण है।

इसके अलावा प्रसव के दौरान श्वसन तंत्र में संक्रमण भी नवजात के मौत की एक वजह मानी जा रही है।

विभाग की मानें तो ये आंकड़ेे और भी बड़े हो सकते हैं, कारण सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के साथ निजी अस्पताल स्टिल बर्थ रिपोर्ट नहीं करते हैं। इसके बाद भी महकमा सटीक रिपोर्ट के लिए प्रयास नहीं कर रहा है।

पिछले साल 1064 शिशुओं की मौत
स्वास्थ्य विभाग नवजातों की मौत पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। कुपोषण गर्भवती महिलाओं व नवजात शिशुओं की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है।

वर्ष 2014 में 1064 नवजात शिशुओं की प्रसव के दौरान या बाद में मौत हुई थी। हर माह औसतन 88 नवजात शिशुओं ने दम तोड़ा था।

इस वर्ष अभी छह महीने हुए हैं और 415 नवजात शिशुओं की मौत हो गई है। ऐसे में शिशु मृत्युदर का आंकड़ा बीते साल का रिकॉर्ड तोड़ देगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। 

समय पर इलाज व जांच जरूरी
 मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अजय वर्मा ने कहा कि यदि गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और डॉक्टर के परामर्श के अनुसार दवाएं मिलती रहें तो यह भयावह नौबत न आए।

उन्हें ठीक तरह से पौष्टिक भोजन भी नहीं मिल पा रहा है। गर्भवती महिलाओं के परिजनों को भी खास ध्यान रखना चाहिए। इससे काफी हद तक शिशु व मातृ मृत्युदर पर अंकुश पाया जा सकता है।        
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