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चौधरी चरण सिंह की 35 वीं पुण्य तिथि पर विशेष---

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संवाद न्यूज एजेंसी
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बड़ौत। किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह को बिछड़े हुए 35 साल बीत गए है। मगर, आज भी वह किसान और मजदूरों के दिलों में जिंदा है। देश और समाज के उत्थान की दिशा में उठाए गए उनके कदमों को आज भी हर कोई याद करता है। किसानों और मजदूरों का मानना है कि यदि उनके मसीहा आज जीवित होते तो उन्हें परेशानी भरे दिन देखने नहीं पड़ते।
एक मुलाकात में बड़े चौधरी का होकर रह गया
रालोद जिलाध्यक्ष सुखबीर सिंह गठीना पुरानी यादों को सुनाते हुए कहते हैं कि पहली बार वर्ष 1979-80 में उनसे मिलने दिल्ली गया था। उन्होंने पूछा था कि कोई काम बताओ। मैंने कहा कि सिर्फ मिलने आया हूं। बड़े चौधरी ने कहा कि था मिलना भी बड़ा काम है। जीवन में इमानदारी, किसान और गरीब की सच्ची सेवा की सीख वह हर कार्यकर्ता को देते थे।
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किसानों की आवाज उठाने वाले थे
रालोद नेता विश्वास चौधरी ने बताया कि उन जैसा व्यक्तित्व राजनीति में फिर नहीं आया। वह किसान और गरीब की चिंता करने वाले थे। कहा कि चौधरी साहब बहुत गंभीर और विचारशील थे। अत्यंत ईमानदार, किसानों और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने वाले थे।
आंख बंद करके भरोसा करते थे किसान
पूर्व प्रमुख सतेंद्र मलिक ने कहा कि चौधरी चरण सिंह पर किसान आंख बंद करके भरोसा करते थे। किसान हितों के लिए उन्होंने बड़े कदम उठाए। वे अर्थशास्त्र के बड़े जानकार थे।
युवाओं को राजनीति में आगे बढ़ाया
रालोद नेता संजीव मान ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह गांव, गरीब और किसानों के मसीहा थे। किसान घर में जन्मे और ताउम्र किसानों की लड़ाई लड़ते रहे। युवाओं को राजनीति में आगे बढ़ाया।
उनकी पहचान ईमानदारी रही
रालोद नेता अरुण तोमर बॉबी और किसान नेता विक्रम आर्य ने कहा कि ईमानदारी उनकी पहचान रही। यही वजह है कि जिस दिन उनका निधन हुआ तब उनके खाते में सिर्फ 470 रुपये थे। उन्होंने सरकार से चौधरी साहब को भारत रत्न देने की मांग की गई।
बड़े चौधरी छपरौली में हमेशा अजेय रहे
छपरौली अकेली ऐसी सीट है, जिस पर अभी तक रालोद ने कोई चुनाव नहीं हारा। चौधरी साहब यहां से 1937, 1946, 1952, 1957, 1962, 1967, 1969 और 1974 में विधायक चुने गए। लखनऊ में छपरौली की आवाज बनकर किसानों की लड़ाई लड़ी। पहला लोकसभा चुनाव मुजफ्फरनगर से लड़े, लेकिन हार गए। इसके बाद वह बागपत सीट से चुनाव लड़े। 1977 में बागपत से पहली बार सांसद बने और देश के प्रधानमंत्री बने।
किसान-मजदूरों को करते रहे एकजुट
किसान परिवार में जन्मे चौधरी चरण सिंह आजादी के आंदोलन में जेल भी गए। कांग्रेस से जुड़े और सबसे लंबे समय तक इसी पार्टी में रहे। करीब 45 साल के सियासी सफर में सात पार्टियां भी बनाई। नागपुर में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के 64वें अधिवेशन में चरण सिंह ने सहकारी खेती के विरोध में आक्रामक भाषण दिया था। उन्होंने सहकारी खेती को एक व्यवस्था के तौर पर भारतीय स्थितियों के पूरी तरह प्रतिकूल बताया। इसके बावजूद सहकारी कृषि के पक्ष में प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया। यहीं से कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के वह निशाने पर आने शुरू हो गए थे। हालात इतने बिगड़े कि 1967 में उन्होंने जन कांग्रेस बनाई। 1968 में भारतीय क्रांति दल, 1974 में भारतीय लोकदल, 1977 में जनता पार्टी, 1980 में लोकदल और 1984 में दलित मजदूर किसान पार्टी का गठन किया था।
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छपरौली से दिल्ली तक चौधरी चरण सिंह की धमक
जनपद गाजियाबाद के नूरपुर गांव में किसान मीर सिंह के घर 23 दिसंबर 1902 में चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ। जब वह छह साल के थे तो उनके पिता मेरठ के पास जानी खुर्द में आकर बस गए थे। आगरा विवि से लॉ की डिग्री लेकर गाजियाबाद में प्रैक्टिस की। वह गरीबों से मुकदमे की फीस भी नहीं लेते थे। 1929 में गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 1937 में वह पहली बार बागपत-गाजियाबाद क्षेत्र से प्रांतीय धारा में चुनकर गए। 1964 में उन्होंने किसान हित में मंडी समिति बिल को विधानसभा में पारित कराया।
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