अग्रवाल मंडी टटीरी (बागपत)। रमजान मुबारक माह के 20 रोजों के बाद एतकाफ का समय शुरू होता है। रमजान मुबारक में हर मुसलमान का रोजा रखना फर्ज है। कस्बे की देशवाल पट्टी स्थित मस्जिद में सुबह नमाज के बाद तकरीर करते हुए मौलाना हाजी जहीर अहमद ने कहा कि एक सुन्नत ऐसी भी है जिसको गांव या बस्ती में एक आदमी भी अता कर दे तो पूरी बस्ती से अता हो जाती है। एक आदमी भी अता न करें तो उसका गुनाह पूरी बस्ती पर होता है।
रमजान के आखिरी अशरे में दस दिन का एतकाफ होता है। एतकाफ मतलब शबे कद्र की तलाश में तन्हाई में बैठकर इबादत करना है। एतकाफ का समय 20वें रोजे को सूरज डूबने से पहले शुरू होता है और ईद का चांद दिखाई देने के बाद खत्म होता है। मौलवी हाजी जहीर अहमद ने कहा कि एतकाफ ऐसी जगह होती है जहां पांचों वक्त की नमाज जमात के साथ होती है। एतकाफ में बैठा व्यक्ति रात-दिन मस्जिद में रहकर इबादत करता है। उसका खाना-पीना सब मस्जिद में ही होता है। एतकाफ में बैठने का सबाब दो हज और दो उमरे के बराबर है। जो इंसान अल्लाह को खुश करने के लिए एक दिन का एतकाफ करता है। जहन्नुम को उससे जमीन और आसमान के बीच की दूरी से तीन गुना दूर कर दिया जाता है। एतकाफ में बैठा व्यक्ति फजूल बातों से दूर रहकर अल्लाह का महबूब बन जाता है। वह रात दिन इबादत में लगा रहता है और बेशुमार शबाब का हकदार बन जाता है। एतकाफ में बैठना सुन्नत है। इससे अल्लाह ताला पूरी बस्ती के गुनाहों को माफ फरमा देते हैं।