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इंद्रियों को वश में कर लेना ही तप

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संवाद न्यूज एजेंसी
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बिनौली। बरनावा के श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में पर्युषण पर्व माघ माह के उपलक्ष्य में चल रहे दशलक्षण पर्व के सप्तम सोपान पर श्रद्धालुओं ने उत्तम तप धर्म का अंगीकार किया। दस श्रीफल समर्पित कर भगवान चंद्रप्रभु की पूजा अर्चना की।
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पंडित प्रदीप पीयूष शास्त्री ने कहा की अहिंसा, संयम एवं तप के त्रिवेणी संगम से आत्मा पुनीत बन जाती है। समस्त कर्मों को नष्ट करने का सामर्थ्य तप में है। जिस प्रकार तिल को बिना पीड़ित किए तेल की प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार कर्ममल से मुक्त होने के लिए आत्मा को तपाना आवश्यक है। इंद्रिय विषयों को निग्रह करना ही तप है। कर्मों का क्षय करना भी तप है। इच्छाओं को रोकना या मन को वश में करना अथवा विषयों के प्रति इंद्रिय रुझान को रोकना तप है। उन्होंने कहा कि तप यश, कीर्ति, पूजा, प्रख्याति, लाभ आदि वांछा से रहित होता है। तप के दो भेद होते हैं, अंतरंग तप और बही रंग तप। मानव का चित्र भी एक दर्पण है। सत्य की प्रतीति के लिए चित्र का निर्मल होना अत्यंत आवश्यक है। जिस प्रकार व्यक्ति अपने बर्तनों को मांजता है, उन्हें धोता है, निर्मल करता है, उन पर धूल जमने नहीं देता, तुम भी अपने मन को इसी प्रकार से मांझों। उस पर वासना की मिथ्या विचारों की धूल मत जमने दो। पूजा अर्चना में बादामी देवी जैन, सरिता जैन, मनी जैन, लोकेश जैन, राजेन्द्र जैन, सीता जैन, मोहित जैन आदि उपस्थित रहे है।
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