बड़ौत। तीर्थंकर वर्धमान महावीर ने अपने उपदेशों में कहा कि व्यक्ति कर्म से ही ब्राह्मण है और कर्म से ही क्षत्रिय और अपने कर्म से ही वैश्य शूद्र होता है। जाति से कोई भी शुद्र या ब्राह्मण नहीं होता, व्यक्ति की पहचान का प्रमुख आधार है, उसका विशुद्ध आचार-विचार, ना की जाति! चांडाल के घर में जन्मा हुआ व्यक्ति भी उत्कृष्ट तपस्या से ब्राह्मणत्व को पा सकता है! अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए उन्होंने आगे कहा जिसमें ना कपट है, ना माया है, ना स्वार्थ - तृष्णा और ना ही क्रोध है, वही ब्राह्मण है! वही श्रमण है! और वही भिक्षु भी है।
शहजाद राय शोध संस्थान के निर्देशक अमित राय जैन बताते है कि महाभारत के अनुसार नागराज के प्रश्न पूछने पर युधिष्ठिर ने भी ब्राह्मण शब्द की इसी से मिली जुली सी व्याख्या की। इसमें सत्य, दान, क्षमाशील, क्रूरता का अभाव और दया है। सब सद्गुण दिखाई दें वही ब्राह्मण है, भगवान महावीर के शब्दों में तात्विक दृष्टि से मनुष्य जाति एक ही है । यह सारे भेद कर्म जनित है। जाति, नाम, कर्म के उदय से मनुष्य जाति एक ही है, वृत्ति भेद के आधार पर यह चार भेद वर्णों के रूप में कर दिए गए। भगवान महावीर ने धर्माधिकार सभी को समान रूप से दिया।
उन्होंने कहा धर्म एक ऐसा सार्वभौम सत्य है, जिसे हर आत्मा अपना सकती है, धर्म रूपी भवन का द्वार सबके लिए सदा खुला है। बताया गया कि ऐतिहासिक तथ्यों से सिद्ध होता है कि भगवान महावीर के समय में जात पात में भेदभाव का अत्यधिक विस्तार था , स्वयं भगवान महावीर को अपने युग में जातिप्रथा को तोड़ने के लिए कष्टों को सहन करना पड़ा, परंतु उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में जात पात के भेदभाव को मिटाने के लिए अपने धर्म और उपदेशों का विस्तार सभी जातियों के लिए समान रूप से किया।
विनोद कुमार जैन एडवोकेट बताते हैं कि उनके धर्म संघ में जहां उच्च कुलीन अनेक सम्राटों, राजकुमारों, महामंत्रियों ने मुनि दीक्षा ग्रहण करी, वही उन्होंने अपने धर्म संघ की परंपरा में तेली, दलित, चांडाल, चर्मकार, बढ़ई आदि जातियों के व्यक्तियों को अपना शिष्य बनाकर जातिप्रथा को तोड़ने का काम किया। आज वर्तमान में भी तीर्थंकर महावीर के उपदेशों से प्रेरित होकर ढाई हजार वर्षों के बाद भी जैन मुनियों में करीब 50 प्रतिशत जैन मुनि जाट, यादव, कुम्हार, ब्राह्मण आदि पारिवारिक पृष्ठभूमि से हैं, इनको जैन समाज द्वारा अत्यधिक सम्मान पूर्ण दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय सभ्यता संस्कृति के महापुरुषों में 2500 वर्ष पूर्व जैन तीर्थंकर भगवान महावीर जाति प्रथा को तोड़ने वाले एक विशिष्ट व्यक्तित्व के रूप में संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन आज भी कर रहे हैं।