फोटाे संख्या 5
बड़ौत। श्री अजितनाथ धर्मशाला मंडी बड़ौत में चल रही धर्मसभा में शनिवार को मुनि विशुभ्र सागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति की इच्छाओ का कोई अंत नहीं है। जब तक इच्छाओं का अंत नहीं होगा, शांति नहीं मिल सकती।
उन्होंने कहा कि सच में मनुष्य के मन की तृष्णा को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। जीवन पर्यन्त हम अपनी तृष्णा को पूरा करने की कोशिश करते हैं। अपनी इच्छाओं-आकांक्षाओं को पूर्ण करने की कोशिश करते हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने की कोशिश करने में हमारी जिदगी पूरी हो जाती है, तब भी इच्छाएं पूरी नहीं होतीं। जीवन को दु:खी बनाने वाले कारणों में एक कारण है। किसी भी वस्तु के प्रति हमारा ध्यान केन्द्रित होता है। हमारे मन में उनके प्रति आकर्षण से लगाव बढ़ता है । लगाव बढ़ने से उसे पाने की इच्छा जागृत होती है और फिर तृष्णा उत्पन्न होती है। हमारे मन में मोह जन्म लेता है और वहीं से हमारे मन में दु:ख की उत्पत्ति हो जाती है। कहा कि आज के मनुष्य का दुःख उसकी आवश्यकताओं के कारण नहीं है, अपितु उसकी आकांक्षाओं के कारण है। आवश्यकताओं को बढ़ाना या घटाना मनुष्य के हाथ में है और सरल है। कहा कि हमारे मन में जितनी अधिक आकांक्षाएं होंगी, उतना ही अधिक वह अशान्त होगा। सभा में सुभाष जैन, प्रमोद जैन, सुधीर जैन, राजकुमार जैन, वरदान जैन, हंस कुमार जैन, अंकुर जैन, अनिल जैन, राकेश जैन, मुकेश जैन मौजूद रहे।