कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब से शुरू हुए आंदोलन को मुकाम तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने पहुंचाया। दिल्ली लालकिले पर 26 जनवरी को आंदोलन के दौरान हिंसा हुई तो एक बारगी हर कोई सकते में आ गया। 27 जनवरी को आंदोलन खत्म होने के कगार पर पहुंच गया, ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने संजीवनी देकर दोबारा से आंदोलन को खड़ा किया। दिल्ली के बॉर्डर पर बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, सहारनपुर, बिजनौर, बुलंदशहर, हापुड़, मुरादाबाद, अमरोहा समेत आसपास के कई जिलों के किसान गाजीपुर बॉर्डर पर पहुंच गए। संयुक्त किसान मोर्चा के नेता खुद भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि किसान आंदोलन को मंजिल तक पहुंचाने में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की अहम भूमिका रही हैं।
कृषि कानूनों के विरोध की शुरुआत पंजाब से हुई और वहां के किसानों ने ही सबसे पहले 26 नवंबर 2020 को दिल्ली की सीमा पर धरना शुरू किया था। इसके बाद हरियाणा व पंजाब के किसान भी आंदोलन से जुड़े और अन्य राज्यों तक यह किसान आंदोलन पहुंचा। उसके बाद भी आंदोलन में पंजाब का दबदबा रहा। इसके पीछे बड़ी वजह थी संयुक्त मोर्चा में शामिल 40 संगठनों में अकेले पंजाब के 32 संगठन थे। लेकिन 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर परेड के दौरान बवाल होने के बाद 27 जनवरी को आंदोलन खत्म होने लगा। भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत की भावनात्मक अपील हर किसी के दिल को छू गई और उसका ही असर रहा कि बागपत, मुजफ्फरनगर व शामली समेत कई जिलों के किसान आधी रात में भारी संख्या में सीमा पर पहुंच गए। अगले ही दिन अन्य जिलों के किसान बड़ी संख्या में सीमा पर पहुंचे और आंदोलन को पहले से ज्यादा मजबूती से खड़ा कर दिया।
इसके बाद आंदोलन में यूपी की सबसे ज्यादा पकड़ हो गई। अब कानून वापस लेने की घोषणा के बाद हर किसी का यही मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के आंदोलन को दोबारा खड़ा करने पर ही इसे मंजिल तक पहुंचाया जा सका है।
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