फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पश्चिमी यूपी ने दिखाया दम: आखिर बदल गया मोदी सरकार का बड़ा फैसला, पढ़िए किसानों के संघर्ष की कहानी

Sat, 20 Nov 2021 01:28 AM IST
कपिल kapil अंकित चौहान, अमर उजाला ब्यूरो, बागपत

सार

किसान आंदोलन भले ही पंजाब से शुरू हुआ हो लेकिन, उसे मुकाम तक पहुंचाने का काम पश्चिमी यूपी के किसानों ने किया है। पढ़िए पश्चिमी यूपी के संघर्ष की पूरी कहानी।
विज्ञापन
किसान आंदोलन फाइल फोटो। - फोटो : amar ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब से शुरू हुए आंदोलन को मुकाम तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने पहुंचाया। दिल्ली लालकिले पर 26 जनवरी को आंदोलन के दौरान हिंसा हुई तो एक बारगी हर कोई सकते में आ गया। 27 जनवरी को आंदोलन खत्म होने के कगार पर पहुंच गया, ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने संजीवनी देकर दोबारा से आंदोलन को खड़ा किया। दिल्ली के बॉर्डर पर बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, सहारनपुर, बिजनौर, बुलंदशहर, हापुड़, मुरादाबाद, अमरोहा समेत आसपास के कई जिलों के किसान गाजीपुर बॉर्डर पर पहुंच गए। संयुक्त किसान मोर्चा के नेता खुद भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि किसान आंदोलन को मंजिल तक पहुंचाने में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की अहम भूमिका रही हैं। 

विज्ञापन


कृषि कानूनों के विरोध की शुरुआत पंजाब से हुई और वहां के किसानों ने ही सबसे पहले 26 नवंबर 2020 को दिल्ली की सीमा पर धरना शुरू किया था। इसके बाद हरियाणा व पंजाब के किसान भी आंदोलन से जुड़े और अन्य राज्यों तक यह किसान आंदोलन पहुंचा। उसके बाद भी आंदोलन में पंजाब का दबदबा रहा। इसके पीछे बड़ी वजह थी संयुक्त मोर्चा में शामिल 40 संगठनों में अकेले पंजाब के 32 संगठन थे। लेकिन 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर परेड के दौरान बवाल होने के बाद 27 जनवरी को आंदोलन खत्म होने लगा। भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत की भावनात्मक अपील हर किसी के दिल को छू गई और उसका ही असर रहा कि बागपत, मुजफ्फरनगर व शामली समेत कई जिलों के किसान आधी रात में भारी संख्या में सीमा पर पहुंच गए। अगले ही दिन अन्य जिलों के किसान बड़ी संख्या में सीमा पर पहुंचे और आंदोलन को पहले से ज्यादा मजबूती से खड़ा कर दिया। 

इसके बाद आंदोलन में यूपी की सबसे ज्यादा पकड़ हो गई। अब कानून वापस लेने की घोषणा के बाद हर किसी का यही मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के आंदोलन को दोबारा खड़ा करने पर ही इसे मंजिल तक पहुंचाया जा सका है।
विज्ञापन


यह भी पढ़ें: यूपी में ताबड़तोड़ हत्याएं: मंत्री और अफसरों के दावों की खुल रही पोल, हाईवे पर हो रहे दिनदहाड़े कत्ल, सबूत हैं ये तस्वीरें

विज्ञापन

यह पूरे देश का खेती व किसान को बचाने का आंदोलन था। आंदोलन में उतार-चढ़ाव आया और 26 जनवरी की घटना के बाद एक गलत संदेश दिया गया तो आंदोलन में कुछ दिक्कत आई। उस वक्त यूपी के किसानों ने बड़ी हिम्मत दिखाई और खासकर पश्चिमी यूपी के जिलों के किसान तुरंत ही दोबारा दिल्ली के बॉर्डर पर पहुंच गए। जिसके बाद से आंदोलन लगातार बढ़ता गया और अब सरकार को कानून वापस लेने पड़े। - डॉ. दर्शनपाल, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा 

यह भी पढ़ें: 
मर्डर की तस्वीरें: सराफ को दिनदहाड़े चाकू से गोदकर मार डाला, सामने आई अनैतिक संबंध की बात, खौफनाक है वारदात

इस आंदोलन में यूपी के किसान हर जगह आगे खड़े रहे और इनमें भी खासकर दिल्ली के आसपास के जिलों के किसान सबसे ज्यादा बॉर्डर पर डटे रहे। यह उन सभी किसानों की जीत है जो आंदोलन में शामिल हुए। यहां का किसान हिम्मत वाला है और वह कुछ ठान लेता है तो अपनी बात मनवाकर ही मानता है। इस आंदोलन में किसान की जीत हुई है और अब संसद सत्र का इंतजार है। - युद्धवीर सिंह, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें