खेकड़ा से वापस अपने घर सहारनपुर एवं गाजियाबाद लौटते लोग।
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बागपत। लॉकडाउन में इंसानियत के शर्मसार होने का सुबूत सड़कों पर दिख रहा है। किसी की मजदूरी छिन गई, किसी की नौकरी। पहले फैक्ट्री से निकाले गए और इसके बाद मालिकों ने मकान और आवास खाली करा लिए। बेबसी का कारवां चंडीगढ़, हरियाणा और राजस्थान के विभिन्न जिलों से अपनी मिट्टी की ओर बढ़ा जा रहा है। थकान से चूर बच्चों का खेल छूट गया है। बड़े बेबस हैं। एक ही धुन है, बस किसी तरह घर पहुंच जाएं।
उन्नाव का सुखपाल अपने परिवार के साथ ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे के मवी कलां कट पर पहुंचा। पत्नी वीरो और पांच साल की बेटी रीना के साथ वह चंडीगढ़ की एक फैक्टरी में रहता था। वह बताता है कि पिछले दो दिन से कहीं लिफ्ट लेकर कहीं पैदल चलकर वह अपने घर पहुंचना चाहते हैं। लॉकडाउन के बाद फैक्टरी मालिक ने तनख्वाह देने से तो इंकार कर ही दिया, साथ में यह भी कह दिया कि हालात सुधरने तक घर चले जाओ। सड़कों पर वाहन नहीं हैं, ऐसे में पैदल चलने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।
लखीमपुर खीरी के घनश्याम ने बताया कि पानीपत से आए हैं। फैक्टरी मालिक ने पिछले तीन महीने का हिसाब भी नहीं किया। बस यह कह दिया कि अभी घर चले जाओ, हालात सुधरेंगे तो देखा जाएगा। जेब खाली है, पैदल ही चल दिए। रास्ते में मददगार खाने का इंतजाम कर रहे हैं, लेकिन अपने घर की ओर बढ़ रहे लोगों को वाहन की जरूरत है। सीतापुर के गोल्डी, मुकेश और आजमगढ़ के अखिलेश का दर्द भी यही है। लॉकडाउन में फैक्टरी मालिकों ने रहने की इजाजत ही नहीं दी, जेब खाली हुई तो अपना गांव और घर याद आया।
बागपत के ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेस-वे पर वाहन से जाते मजदूर।- फोटो : BAGHPAT