बागपत के युवा हाथों पर बनवा रहे हैं श्रीराम के टैटू।
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राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर पूरे देश में जश्न का माहौल है। हर कोई रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उत्साहित है। बागपत में भी युवाओं में गजब का उत्साह देखने को मिल रहा है। इस समय युवा रामधुन में रम गया है और तन पर प्रभु श्रीराम की स्मृति को सहेज रहा है। युवा चेहरे, हाथ व पीठ पर प्रभु श्रीराम के नाम का टैटू बनवा रहे हैं। रोजाना इसकी संख्या बढ़ रही है।
राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से पहले उत्सव जैसा माहौल है। यहीं कारण है कि जहां लोग इस बार 22 जनवरी को दीपावली मनाएंगे और घर में दीये जलाएंगे तो वहीं युवा भी खुद को रामभक्ति में विलीन कर अपने तन पर प्रभु श्रीराम की स्मृति के रूप में भगवान राम, अयोध्या धाम, जय श्री राम, राम-राम, सीताराम, यतो धर्मस्ततो जय: और सियावर राम के नाम का टैटू बनवा रहे हैं। रोजाना 80 से ज्यादा युवा राम नाम का टैटू बनवाने आ रहे हैं। पहले जो युवा हाथ पर पत्नी या फिर प्रेमिका के नाम का टैटू बनवाते थे, वह भी राम नाम जप रहे हैं। अब राम के नाम का टैटू बनवा रहे हैं।
5000 से अधिक युवा बना चुके है टैटू, कॉलर से लेकर रिंगटोन तक राम ही राम
घुमक्कड़ बाबा टैटू स्टूडियो के संचालक विजय तोमर ने बताया कि प्रभु श्रीराम के टैटू बनवाने में युवतियां भी पीछे नहीं हैं। अब तक 5000 से अधिक युवा टैटू बनवा चुके हैं। इतना ही नहीं कॉलर से लेकर रिंगटोन तक तो मोबाइल में भगवान श्रीराम के नाम की पहले ही सेट हो गई थी, अब टैटू बनवाने की होड़ भी युवाओं से लेकर युवतियों में होने लगी है।
अस्थायी में 20 मिनट तो स्थायी टैटू बनवाने में लगता है एक घंटा
टैटू बनाने वाले विजय बावली का कहना है कि टैटू दो तरह से बनते हैं। अस्थायी टैटू बनवाने में 20 मिनट लगते हैं और वह एक महीने तक ही रहता है। स्थायी टैटू बनाने में करीब एक घंटा लगता है और यह लंबे समय तक रहता है।
बढ़ रहा युवाओं में क्रेज
जैसे-जैसे प्राण-प्रतिष्ठा की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे हाथ, चेहरे और पीठ पर प्रभु श्रीराम के नाम का टैटू बनवाने का क्रेज बढ़ रहा है। श्रीराम की धनुष लिए तस्वीर का टैटू भी बनवाया जा रहा है।
तोहफे में दे रहे राम के खिलोने
सबसे खास बात यह है कि कुछ समय पूर्व तक जहां बच्चों के जन्म पर अलग-अलग तोहफे दिए जाते थे, वहीं अब भगवान श्रीराम से जुड़े तोहफे दिए जा रहे है। स्कूल, कॉलेज में भी भगवान श्रीराम के बारे में बात करते बच्चों को देखकर लग रहा है, वे अपनी संस्कृति के करीब पहुंच रहे हों।