विश्व कैसर दिवस पर विशेष
- बोले, सकारात्मक चिंतन और हौसले के बूते दी जा सकती है कैंसर को मात
संवाद न्यूज एजेंसी
बड़ौत। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी पर भी विजय पाना मुमकिन है। जिंदादिली और आत्मबल कैंसर को मिटाने में सबसे मददगार हैं। शहर में कई लोगों ने कैंसर को हराकर यह साबित भी किया है। कैंसर को मात देने के बाद अब ये लोग खुशहाल जीवन जी रहे है। ऐसे ही कुछ लोगों से अमर उजाला ने बातचीत की। उन्होंने बताया कि निराशा हमेशा शरीर को कमजोर करती है। तनाव रहित, प्रसन्न मानसिक अवस्था में कैंसर को जीता जा सकता है।
मोहन नगर कॉलोनी के रहने वाले भूतपूर्व सैनिक 77 वर्षीय जयपाल मूलरूप से दोघट के रहने वाले है। आठ साल पहले बार-बार बुखार आने के कारण वह मेरठ के सैन्य अस्पताल में पहुंचे। पहले तो चिकित्सक उन्हें एंटीबायोटिक और हार्ट संबंधी दवाई देते रहे। मगर, सेहत में सुधार न होने पर उनकी जांच कराई गई तो उन्हें ब्लड कैंसर की पुष्टि हुई, जो लगभग तीसरी स्टेज पार कर चुका था। इसके बाद सैन्य अस्पताल में ही उनका कीमोथेरेपी सहित महंगा इलाज चलता रहा। छह माह के इलाज के बाद चिकित्सकों ने जवाब दे दिया और परिजन उन्हें घर ले आए। एक महीने तक तक बिस्तर पर रहने के बाद उनकी हालत में कुछ सुधार हुआ तो परिजन पुन: सैन्य अस्पताल ले गए। इसके बाद उनका दोबारा इलाज शुरू किया गया। इस बार उनकी हालत सुधरने लगी। धीरे-धीरे उनके शरीर से कैंसर से पूरी तरह खत्म हो गई। अब वह एक स्वास्थ्य जीवन जी रहे हैं। बकौल जयपाल सिंह, इलाज के दौरान कभी भी अपना हौसला नहीं छोड़ा और हमेशा हंसते-मुस्कुराते इलाज कराते रहे। उन्हें पूरा विश्वास था कि कैंसर को वह हराकर देंगे।
किशन बराल गांव के पूर्व ग्राम प्रधान 72 वर्षीय ईश्वर सिंह भी कैंसर को हराकर स्वस्थ जीवन जी रहे है। तीन साल पहले उनकी कमर में फोड़ा था, जो कैंसर में तब्दील हो गया। उपचार के बावजूद यह शरीर के दूसरे अंगों में फैलता चला गया। इस दौरान कीमोथेरेपी सहित लाखों रुपयों की अंग्रेजी दवाएं उन्होंने खाई, मगर आराम नहीं मिला। अंग्रेजी दवाओं से लाभ नहीं मिला तो आयुर्वेदिक दवाइयों से इलाज शुरू किया गया। इसके लिए वह गुजरात में वलसाड जिले के आरएमडी आयुर्वेदिक कॉलेज एंड हॉस्पिटल में उपचार शुरू कराया गया। यहां 11 दिनों तक चिकित्सा और जरूरी प्रशिक्षण देने के बाद उन्हें घर भेज दिया गया। घर पर हॉस्पिटल के दिशा-निर्देशों के साथ आयुर्वेदिक दवाओं लेते रहे तो उनके स्वास्थ्य में तेजी से सुधार होने लगा। ईश्वर सिंह के मुताबिक अब तीन साल से वह आयुर्वेदिक दवाएं ले रहे है। छह महीने पूर्व कराए गए चेकअप में उनके शरीर से कैंसर सेल्स पूरी तरह समाप्त मिला। अब दवाइयां भी काफी कम कर दी है। सुबह-शाम दो से तीन किमी पैदल चलते हैं और सुपाच्य भोजन लेकर स्वास्थ्य जीवन जी रहे हैं।
कैंसर कोई लाइलाज बीमारी नहीं
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अनिल जैन और डॉ. दिनेश बंसल ने बताया कि कैंसर बेशक जानलेवा बीमारी है, पर ऐसा भी नहीं कि इससे लड़ा नहीं जा सकता। 90 प्रतिशत से ज्यादा मरीजों का फर्स्ट स्टेज में इलाज हो सकता है। सेकंड स्टेज में यह अनुपात करीब 70 प्रतिशत है। तीसरे चरण में 40 और चौथे चरण में 10 प्रतिशत से भी कम रह जाता है। फिर भी कैंसर कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। बस थोड़ी हिम्मत और हौसले की जरूरत होती है।