-जैनमुनि बृहस्पतिवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोले
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बड़ौत। दिगम्बर जैनाचार्य विशुद्धसागर ने कहा कि रोटी अंगारे पर सिकती है, पर अंगारे को मुख में नहीं रखा जाता है। उपकारी का उपकार मानो, पर उपकारी को सर्वस्व मत सौंपो। कोई भी कषाय आनन्द नहीं देती, कषाय तो कष्टकारी ही होती है। संकटों से बचना है तो क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय से स्वात्म रक्षा करो।
जैनमुनि बृहस्पतिवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जीवन एक संघर्ष है। हर क्षण धैर्य, साहस, विवेकपूर्वक जिंदगी जीना सीखो। पल भर का आवेग, क्षण भर का रोष, अल्प क्रोध भी आपको जीवन भर रुला सकता है। जोश में होश मत खोना। मानव का पल-पल महत्वपूर्ण है। एक क्षण भी व्यर्थ मत जाने दो। हर पल सजग रहकर जीवन जीना प्रारम्भ करो। मित्रता करने के पूर्व जानो, पहचानो फिर मित्रता करो। विवेक के अभाव में किया गया निर्णय एवं कार्य कभी सुखद नहीं होता है। जो कार्य करने के उपरान्त दुःख हो और जिसका फल अशांतिकर हो वह त्याग्य ही है। जिस कार्य से सुख हो, जिसका फल सुखद हो, नहीं कार्य करो। यश पूर्वक जीवन जीना सीखो। कषायों का विराम करो, कल्याण मार्ग पर चलो। संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। धर्मसभा में हर्षित जैन, संजय जैन, वीरेन्द्र जैन, धुनेन्द्र जैन, पिन्टी जैन आदि शामिल रहे।