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Baghpat News: भोग छोड़ो, योग धारण करो, उत्साहपूर्ण जीवन जियो

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-ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में विशुद्ध सागर महाराज ने किए प्रवचन
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फोटो संख्या 7
बड़ौत। जैनाचार्य विशुद्धसागर ने कहा कि भावना को हमेशा श्रेष्ठ ही मानना चाहिए। भावना भव नाशनी होती है। शुभ-भावना से शुभासव होता है और अशुभ भावना से अशुभ आस्रव होता है। जितना कर्म का बंध व्यक्ति भोग भोगकर नहीं करता है, उससे भी अधिक बंध व्यक्ति भोग-भावना से कर लेता है।
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जैन मुनि सोमवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भोग ही रोग है और अतिभोग भयंकर बीमारियों की जड़ है। भोगों में लिप्त होकर मानव दुर्गति को प्राप्त होता है। भोगों में लिप्त लंपटी मरकर दुर्गति को प्राप्त होता है। भोग-भावना योग-साधना की ओर नहीं बढ़ने देती है। सुख-शांति प्राप्त करना है तो भोगों को छोड़कर योग धारण करो। त्याग ही सुख का साधन है। त्याग से आनन्द आता है। त्याग मुक्ति का साधन है। त्याग मुक्ति का द्वार है। त्याग के मार्ग पर चलने वाला परम-शांति को प्राप्त करता है। त्याग करो, मुक्ति प्राप्त करो। मलिन चित्त धारक शांति प्राप्त नहीं कर सकता। भोजन करना भी एक कला है। अति भोजन बीमारी एवं कुमरण का कारण बन जाता है। परिवार, समाज में उमंग, उत्साह होना चाहिए। उत्साह महाशक्ति है। उमंग के साथ कार्य करो, जो उत्साह के साथ कार्य करेगा, वह सुखद-फल प्राप्त करेगा। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में धनेंद्र जैन, वरदान जैन, दिनेश जैन, अशोक जैन, विनोद जैन, मनोज जैन आदि रहे।
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