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Baghpat News: नसबंदी फेल होने पर नहीं लगा सकते पूर्व सीएमओ व डिप्टी सीएमओ पर जुर्माना

Sun, 24 Aug 2025 11:55 PM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बागपत
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-राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बागपत के सात साल पुराने मामले में दायर की गई अपील पर सुनाया फैसला
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-महिला की नसबंदी के बाद बच्ची होने पर उपभोक्ता फोरम ने पूर्व सीएमओ व डिप्टी सीएमओ पर लगाया था पांच लाख रुपये जुर्माना
-राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने फैसला निरस्त किया तो वादी ने दायर की अपील, अब उसे भी निरस्त किया गया
संवाद न्यूज एजेंसी
बागपत। पूर्व सीएमओ डाॅ. सुषमा चंद्रा व डिप्टी सीएमओ डाॅ. यशवीर सिंह को नसबंदी फेल होने के मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बड़ी राहत दी। इस पर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग से लगाए गए पांच लाख रुपये के जुर्माने को राज्य आयोग ने निरस्त कर दिया तो राष्ट्रीय आयोग में अपील की गई थी। मगर राष्ट्रीय आयोग ने राज्य आयोग के फैसले को सही माना है।
सुल्तानपुर हटाना गांव के रहने वाले सुभाष ने पत्नी बबली की 20 मार्च 2017 को बागपत सीएचसी में नसबंदी कराई थी। नसबंदी कराने के बाद भी उसकी पत्नी गर्भवती हो गई और इस बारे में दिसंबर 2017 में अल्ट्रासाउंड कराने पर पता चला। अगस्त 2018 में उसकी पत्नी ने सरूरपुरकलां सीएचसी में बच्ची को जन्म दिया। उसने 15 लाख 25 हजार रुपये क्षतिपूर्ति के लिए जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में प्रार्थना पत्र दिया। जहां सुनवाई के बाद 22 फरवरी 2022 को पूर्व सीएमओ डाॅ. सुषमा चंद्रा व डिप्टी सीएमओ डाॅ. यशवीर सिंह पर पांच लाख रुपये जुर्माना और दस हजार रुपये वाद व्यय देने के आदेश दिए।
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इस आदेश के खिलाफ डिप्टी सीएमओ डॉ. यशवीर सिंह राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में चले गए। राज्य आयोग ने इसमें 11 सितंबर 2024 को आदेश जारी किया कि यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत नहीं आता है। इसलिए जिला उपभोक्ता फोरम का आदेश अपास्त किया जाता है। मगर राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ सुभाष ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में अपील की। अब इसमें न्यायमूर्ति सुधीर कुमार जैन ने राज्य आयोग के फैसले को सही मानते हुए अपील को निरस्त कर दिया।
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नसबंदी के रुपये नहीं लिए, इसलिए अधिनियम में नहीं आते
राष्ट्रीय आयोग के न्यायमूर्ति सुधीर कुमार जैन ने भी राज्य आयोग के उस फैसले को सही माना कि जिसमें यह कहा गया था कि नसबंदी के बदले रुपये लेने की बात सामने नहीं आई है। इसलिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत वही मामले आते हैं, जिनमें रुपये लिए गए हो। इसके अलावा नसबंदी के बाद यह शत प्रतिशत गारंटी नहीं दी जाती है कि इसके बाद महिला के गर्भवती होने की संभावना नहीं है। इसलिए राज्य आयोग के आदेश को सही मानकर अपील निरस्त कर दी गई।
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