हरिओम त्यागी का कहना है कि ग्रामीण दहशरे पर रावण के पुतले का दहन नहीं करते, बल्कि उनकी पूजा करते हैं। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है।
यह है कथा
मंशा देवी मंदिर के पंडित रमा शंकर तिवारी ने बताया कि हिमालय पर पूजा करने के बाद रावण अपने साथ मंशा देवी की मूर्ति लेकर लंका के लिए चला। वह मूर्ति को लंका में स्थापित करना चाहता था, लेकिन देवी ने शर्त रख दी कि जिस जगह उसे पहली बार रख दिया जाएगा वह वहीं स्थापित हो जाएगी। रावण मूर्ति लेकर चल पड़ा। जब वह बड़ा गांव तक पहुंचा तो मूर्ति एक चरवाहे को देकर लघुशंका के लिए चला गया। चरवाहा मूर्ति का वजन अधिक समय तक नहीं उठा पाया और मूर्ति गांव के बाहर रख दी। शर्त के अनुसार देवी गांव में ही स्थापित हो गई और रावण अकेला लंका के लिए चला गया।
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