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अजीब परंपरा: इस गांव के लोग दशहरे पर करते हैं रावण की पूजा, कभी नहीं किया जाता पुतला दहन

Tue, 08 Oct 2019 02:17 AM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
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बड़ागांव उर्फ रावण गांव में मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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बागपत में एक गांव जो श्रीराम को भी मानता है और रावण का भी सम्मान करता है। ऐसा गांव जहां लंकेश का पुतला दहन नहीं किया जाता। जहां के लोग कहते हैं कि रावण आए तो गांव में मंशा देवी का मंदिर बन गया। यही वजह है कि बड़ागांव को यहां के लोग रावण भी कहते हैं। रावण उर्फ बड़ागांव में रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता। सदियां बीत गई, लेकिन आज तक गांव में रामलीला नहीं हुई। गांव में रावण के पुतले का दहन नहीं करने की परंपरा है। ग्रामीण दहशरे पर रावण की भी पूजा करते हैं। गांव में जैन मंदिर और मंशा देवी मंदिर की वजह से यहां दूरदराज से श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है।

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क्या कहते हैं ग्रामीण
सुरेश कुमार का कहना है कि रावण में लाख बुराइयां थी, लेकिन उनके नाम से गांव को पहचान मिली। गांव में रावण की मूर्ति स्थापित करने का विचार है। इस पर जल्द ही ग्रामीणों की बैठक बुलाई जाएगी।

रामपाल त्यागी व उमेश त्यागी कहते हैं कि गांव के रकबे में रावण कुंड के नाम से भी तालाब है। इसका जीर्णोद्धार कराने का प्रयास किया जा रहा है। ग्राम प्रधान अपने स्तर से इसके जीर्णोद्धार के प्रयास में लगे हुए है।
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हरिओम त्यागी का कहना है कि ग्रामीण दहशरे पर रावण के पुतले का दहन नहीं करते, बल्कि उनकी पूजा करते हैं। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है।

यह है कथा
मंशा देवी मंदिर के पंडित रमा शंकर तिवारी ने बताया कि हिमालय पर पूजा करने के बाद रावण अपने साथ मंशा देवी की मूर्ति लेकर लंका के लिए चला। वह मूर्ति को लंका में स्थापित करना चाहता था, लेकिन देवी ने शर्त रख दी कि जिस जगह उसे पहली बार रख दिया जाएगा वह वहीं स्थापित हो जाएगी। रावण मूर्ति लेकर चल पड़ा। जब वह बड़ा गांव तक पहुंचा तो मूर्ति एक चरवाहे को देकर लघुशंका के लिए चला गया। चरवाहा मूर्ति का वजन अधिक समय तक नहीं उठा पाया और मूर्ति गांव के बाहर रख दी। शर्त के अनुसार देवी गांव में ही स्थापित हो गई और रावण अकेला लंका के लिए चला गया।

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