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मृत्यु तो हर जन्म लेने वाले की होती है : विशुद्ध सागर

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फोटो संख्या 4
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बड़ौत। दिगम्बराचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि अज्ञानी मनुष्य अन्य लोगों की मृत्यु को देखकर दुःखी होता है, शोक करता है, किन्तु भव-समुद्र में डूबते हुए स्वयं के कष्ट को नहीं देखता है। जैसे संसार के प्राणी मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं, वैसे हम भी प्राप्त होंगे मरण को। हम अपने ही कष्टों को नहीं देख पाते और मृत्यु के निकट पहुंच जाते हैं। मृत्यु तो हर जन्म लेने वाले की होती है।
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जैनमुनि रविवार को ऋषभ सभागार मेें दिगंबर जैन समाज समिति द्वारा आयोजित तीन दिवसीय विद्वत गोष्ठी के अंतिम दिन रविवार को धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि धैर्यधारी की भी मृत्यु होती है और अधीर की भी मृत्यु होती है। अज्ञानी, मृत्यु के आने पर रोता है, परन्तु तत्वज्ञानी प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को स्वीकारता है। आचार्य ने कहा कि जगत उद्धार के साथ निज-उपकार, उन्नति, आत्म विकास पर भी दृष्टिपात करो। स्वयं की परिणाम-विशुद्धि वर्धमान हो, आत्म-हित हो, वहीं तक पर कल्याण हितकारी है। विशुद्धि का घात मत करो, पर सुधार से आत्म हित नहीं हो सकता है।स्वयं के सुधार से ही आत्म शांति संभव है। आत्म हितैषी, स्वात्मा का ही अनुचिंतन करता है। स्वात्म-हित चाहने वाला स्वात्म-शांति को महत्वपूर्ण मानता है। स्वात्म-सुख ही सर्वश्रेष्ठ है। आत्म द्रव्य से पर-पदार्थ अत्यंत भिन्न ही हैं। एक अणु मात्र भी साथ जाने वाला नहीं है। मृत्यु परम-उपकारी है, मृत्यु के उपरांत नवीन पर्याय, नवीन शरीर प्रदान करती है। परिवर्तन हो रहा है, होता रहेगा, हमेशा से होता रहा है। संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में पंडित वीर सागर, डॉ़ सोनल शास्त्री, पंडित विनोद रजवास, डॉक्टर कमलेश जैन, ज्योति जैन शामिल रहे।
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