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फांसी में भी तारीख पर तारीख, बढ़ रहा आक्रोश

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बागपत। निर्भया कांड के दोषियों की फांसी में हो रही देरी से महिलाओं व युवतियों में रोष है। कहना है कि मानवाधिकार की सहूलियत का अपराधी नाजायज फायदा उठा रहे है। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा पर मुहर लगा ही दी है, तो एक-एक कर डाली जा रही दया याचिका के नाम पर अब तक उन्हें जिंदा क्यों रखा गया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में जितने दुष्कर्म के दोषी ठहराएं जा चुके है, उन्हें भी आजीवन कारावास के बजाय फांसी ही दी जानी चाहिए। इससे इस प्रकार के जघन्य अपराधों पर रोक लग सके।
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तत्काल फांसी पर लटकाया जाएं
शिक्षिका गुलिस्ता मुमताज का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के बाद जब राष्ट्रपति ने भी दरिंदों की फांसी की सजा पर मुहर लगा दी है, तो अब तक उन्हें फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए।
लचर कानून का लाभ उठा रहे दरिंदे
शिक्षिका गरिमा ढाका का कहना है कि देश की लचर कानून व्यवस्था का दरिंदे लाभ उठा रहे है। उन्हें तत्काल फांसी पर लटका देना चाहिए। इससे दूसरे गुनहगारों को भी सबक मिल सके।
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माफ करने का कोई मतलब नहीं
राखी शर्मा का कहना है कि दरिंदों के वकील ने गुनहगारों को माफ करने की बात कहीं है। उनकी वकील को भी यह सोचना चाहिए कि वह किसकों माफ कराने की बात कह रही है।
दरिंदों को जिंदा रहने का हक नहीं
डा विद्योत्तमा का कहना है कि फांसी की तारीख दो बार टाली जा चुकी है, जो अपने ही देश की कानून व्यवस्था की पोल खोल रही है। दरिंदों को समाज में जिंदा रहने का हक नहीं है।
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