बागपत। किसान मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह आज भी बागपत के लोगों के दिलों में बसते हैं। वह बागपत को अपना घर और लोगों को परिवार मानते थे। किसानों के हित के लिए हमेशा लड़ाई लड़ते रहे और सत्ता में रहते हुए उनके लिए कई बड़े फैसले भी लिए।
बागपत भले ही चौधरी चरण सिंह की जन्मभूमि नहीं थी, लेकिन बागपत उनकी कर्मभूमि रहा है और उनके पूरे जीवन का जुड़ाव बागपत से रहा। यहां की छपरौली सीट से पहली बार 1937 में विधायक बने और उसके बाद से लगातार यहां के लोगों ने उनको अपनी पलकों पर बैठाकर रखा। चौधरी चरण सिंह ने हमेशा किसानों के हितों के लिए फैसले लिए। उनके कारण ही प्रदेश में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और उन्होंने ही लेखपाल के पद का सृजन किया।
चौधरी चरण सिंह ने किसानों के लिए 1954 में उप्र भूमि संरक्षण कानून को पारित किया। 3 अप्रैल 1967 को वह उप्र के मुख्यमंत्री बने और एक साल बाद ही इस्तीफा दे दिया। इसके बाद मध्यावधि चुनाव में उन्हें सफलता मिली और 17 फरवरी 1970 को वह दोबारा मुख्यमंत्री बने। इसके बाद वह केंद्र में गृहमंत्री बने। 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री भी बने और इसके बाद भी बागपत के लोगों से उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ। वह खुद कहते थे कि बागपत ही उनका घर है और यहां के लोग उनके परिवार के सदस्य है।
राजनीतिक नुकसान की परवाह किए बिना किसानों का साथ दिया
चौधरी चरण सिंह ने राजनीतिक नुकसान की परवाह किए बिना किसानों का साथ दिया। नागपुर में जनवरी 1959 में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने खुलकर सामूहिक खेती का विरोध किया और जवाहरलाल नेहरू की नीतियों का इस तरह से विरोध करने पर उनको राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। वह काफी लंबे समय तक कांग्रेस से बाहर रहे, लेकिन किसानों के हित के लिए अपनी बातों पर डटे रहे।
चरण सिंह से जुड़ी यादें आज भी लोगों ने संजोकर रखी
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह से जुड़ी यादों को लोगों ने आज भी घरों में संजोकर रखा हुआ है। किसी के पास उनके साथ खींचे गए फोटो हैं तो किसी के पास उनके भेजे हुए पत्र मौजूद हैं। रालोद के वरिष्ठ नेता ओमबीर ढाका बताते हैं कि चौधरी चरण आज भी यहां के लोगों के दिलों में बसते हैं। उनसे जुड़ी यादें लोगों ने आज भी संजोकर रखी हुई हैं और उनसे जुड़े किस्से आज भी लोग सुनाते हैं। राजू तोमर सिरसली कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह से जुड़े किस्से आज भी यहां सुनाए जाते हैं और उनकी निस्वार्थ राजनीति की मिसाल सभी राजनीतिक दल देते हैं।