मंदिर के संरक्षकों ने माता महाकाली को स्थापित कराया। इसके बाद से मंदिर की दशा बदलनी शुरू हो गई। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती चली गई। सच्चे मन से मन्नते मांगने पर मां ने उसे पूरी कि तो भक्तों ने भजन और कीर्तनों करने शुरू कर दिए। अब आए दिन मंदिर में कीर्तन होते रहते हैं। नवरात्रों की अष्टमी में कई वर्षों से विशाल हवन होता है। इसमें श्रद्धालु भारी संख्या में पहुंचते हैं और माता की आराधना की जाती है।
मंदिर समिति के विशंबर दयाल बताते हैं कि मंदिर का इतिहास तो 600-700 साल पुराना है। पहले मंदिर को कच्चा घाट से जाना जाता था। यमुना मंदिर के पीछे ही बहती थी। साधु तपस्या और योग साधना करते थे। अब शालीग्राम मंदिर के साथ-साथ काली मंदिर से भी विख्यात है। दूर दराज से लोग पूजा अर्चना के लिए पहुंचते हैं। अष्टमी पर विशेष पूजा और हवन होता है, जिसका अलग ही महत्व है।
भगवान विष्णु का रूप है शालीग्राम
मंदिर के पुजारी हर्ष शास्त्री बताते हैं कि शालीग्राम भगवान विष्णु का एक रूप है, जिनकी उत्पत्ति एक नदी से हुई थी। प्राचीन कथाओं के अनुसार वृंदा ने भगवान शालीग्राम को श्राप दिया था।