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अयोग्य व्यक्ति को श्रेष्ठ पद पर आसीन नहीं करना चाहिए : आचार्य विशुद्ध सागर

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फोटो संख्या 12
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बड़ौत। जैनाचार्य विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि ज्येष्ठ वही होता है, जो श्रेष्ठ होता है। श्रेष्ठता के अभाव में ज्येष्ठता शोभायमान नहीं होती है। आयु की ज्येष्ठता के साथ गुणों की श्रेष्ठता ही श्रेष्ठ मानी जाती है।
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जैनमुनि रविवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि योग्यता के अभाव में श्रेष्ठ पद शीघ्र ही छिन जाता है। योग्य व्यक्ति ही योग्य-पद को यश पूर्वक निर्वाह कर पाता है। अयोग्य व्यक्ति यदि योग्य पद पर आसीन हो जाएगा तो वह शोभाहीन प्रतीत होता है। अयोग्य व्यक्ति को श्रेष्ठ पद पर आसीन नहीं करना चाहिए। श्रेष्ठ बनना है तो ज्येष्ठा के अनुरूप आपका प्रभाव होना चाहिए। उच्च-पद पर आसीन होकर कोई भी निर्णय सोच-समझकर लेना चाहिए। मधुर भाषण के साथ, नैतिकतापूर्ण व्यवहार भी होना चाहिए। श्रेष्ठ लोगों को विचारों की पवित्रता के साथ अपने आचरण को भी मधुर रखना चाहिए। पद पाना सरल है, परंतु पद के अनुकूल श्रेष्ठ जीवन जी पाना, कलंक शून्य यशपूर्ण जीवन जीना बहुत कठिन है। भावों की विशुद्धि बहुत दुर्लभ है। धन से साधन जुटाए जा सकते हैं। साधना, पवित्र परिणामों से ही संभव है। परिणाम संभालो। जीवन क्षण भंगुर है। कब, कहां, क्या हो जाएगा? कुछ पता नहीं? गुरु वचनों को सुनो, समझो और संभलो। स्वयं ही स्वयं को संभालना पड़ेगा। समय रहते संभल जाओ, समय को समझो, समय निकलने पर कुछ नहीं पाओगे। सभा में विमल जैन, धनेंद्र जैन, वरदान जैन, जय प्रकाश जैन, इंद्राणी जैन, अंजलि जैन आदि मौजूद रहे।
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