यमुना किनारे खूनी नाव और मौत का सन्नाटा
बागपत। काठा में यमुना का वही किनारा और वही नाव। सैंकड़ों लोग मौजूद, लेकिन किसी ने खूनी नाव में यमुना पार नहीं की। मौत का सन्नाटा ऐसा कि किसान खेतों में नहीं गए। मजदूर अपने घरों में कैद है। किनारे पर पहुंचे लोगों के लिए नाव कौतूहल का विषय जरूर रही। लोगों ने कहा कि दिल्ली से सटे इस जिले के दिन आखिर कब बदलेंगे। सीएम और पीएम देने वाले बागपत के लोगों को रोजमर्रा के जीवन की आम सुविधाएं तक नसीब नहीं है।
शुक्रवार को यमुना के किनारे पर मातमी सन्नाटा पसरा रहा। बिखरी चप्पलें, रेत में पड़ी पानी की बोतलें और खाने की टिफिन हादसे की भयावह बता रहे थे। यह वही किनारा है, जहां काठा के 19 लोग यमुना में समा गए। यह वही किनारा हैं, जहां एक दिन पहले ही चीख-पुकार मची थी और अब केवल मरघटी सन्नाटा है। जो नाव रोजाना काठा के लोगों को यमुना पार कराती थी, वह भी यहीं खड़ी है, लेकिन इसमें कोई सवार नहीं हुआ।
कोई किसान खेत में नहीं गया, न किसी मजदूर ने यमुना पार करने की हिम्मत जुटाई। दिनभर यहां लोग आते रहे। हादसे के गवाह पहुंचे, पीड़ित परिवार के सदस्य भी आए। लोग एक-दूसरे को हादसे की भयावहता बताते रहे। कारण तलाशे गए और एक-दूसरे को दिलाशा दी गई। लोग कहते हैं कि दिल्ली से सटे इस जिले को मूलभूत सुविधाएं कब नसीब होगी। डग्गामार वाहन, खूनी गड्ढ़े, पैंसेजर ट्रेन की परेशानियां, नदियां पार करने के लिए कहीं बल्लियां तो कहीं खूनी नाव का सहारा। सवाल है कि इस जिले की खता क्या है। सीएम दिए और पीएम बनाए। कृषि मंत्री, गृह मंत्री, उद्योग मंत्री, उड्डयन मंत्री....क्या-क्या नहीं दिया, लेकिन बागपत को क्या मिला। काठा का सवाल यही है कि आखिर इस जिले का आम आदमी को मूलभूत सुविधाएं कब नसीब होगी।