उत्तर प्रदेश के जिस गांव में 14 और 16 वर्ष की दो लडकियों की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई है, वहां हर तरफ बेचारगी और गुस्सा नजर आता है। बदायूं जिले के कटरा सादतगंज नाम के इस गांव में पहुंचना भी आसान नहीं है। सडकों की हालत खस्ता है तो बिजली के शायद ही कभी दर्शन होते हों। यहां शौचालय की सुविधा कुछ ही घरों में है।
बुधवार की शाम दो चचेरी बहनें शौच के लिए ही पास के खेत में गई थीं। लेकिन उसके बाद वो कभी नहीं लौटीं। अगली सुबह पेड से उन दोनों के शव लटके मिले। उनका सामूहिक बलात्कार किया गया था।
परिजनों का कहना है कि जब वो अपनी लडकियों के गुम होने की रिपोर्ट लिखाने पहुंचे तो पुलिस वाले उन पर हंसे। परिजनों के यह कहने पर पुलिस वालों ने मजाक उडाया कि उन्होंने अपने पडोसियों से सुना है कि दोनों बहनों के साथ कुछ पुरूष थे।
परिजनों का कहना है कि इस पूरी घटना के पीछे जाति आधारित भेदभाव एक बडी वजह है जबकि पुलिस इससे इनकार करती है।
मां: मेरी बेटी महत्वाकांक्षी थी
इस घटना में मारी गई 14 वर्षीय लडकी की मां ने मुझे उसके स्कूल की कॉपियां दिखाईं, जिन पर हिंदी में सुंदर-सुंदर वाक्य लिखे थे।
उन्होंने बताया कि उनकी बेटी जिंदगी में शादी करने के अलावा कुछ और भी करना चाहती थी। वो काम करना चाहती थी, नौकरी करना चाहती थी। लडकी की मां ने बताया, “वो गांव के लडकों की तरह कॉलेज तक पढना चाहती थी।”
उन्होंने अपनी बेटी को कह दिया था कि उसे आगे पढने दिया जाएगा क्योंकि वो परिवार में सबसे छोटी बेटी थी। उन्होंने बताया कि उनकी पीढी की महिलाएं काम नहीं करती हैं लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को पढाने की पूरी कोशिश की है।
वो शांत थीं लेकिन गुस्से से भरी हुईं भी। वहीं इस घटना की दूसरी शिकार 16 वर्षीय लडकी मां बात की करने की स्थिति में नहीं थीं।
शौचालय न होने का खतरा
बहुत से ग्रामीणों ने बताया कि शौच के लिए खेतों में जाना असली समस्या है। महिलाओं के लिए तो ये समस्या और भी बडी है। उन्हें या तो सुबह तडके या फिर शाम को अंधेरा होने पर ही बाहर जाना पडता है, क्योंकि दिन के उजाले में खुले में शौच करना शर्मिंदगी वाली बात है।
लडकी की मां ने बताया, “पुरूषों के लिए ये आसान है लेकिन हमारे लिए मुश्किल होता है, खास तौर से हमारी माहवारी के दिनों में।” उन्होंने बताया कि जिस खेत में शौच के लिए उनका परिवार जाता है, वहां जाने में पंद्रह मिनट का समय लगता है।
वो कहती हैं, “मैं हमेशा अपनी लडकियों की सुरक्षा को ध्यान में रखती हूं। मैं अपनी और परिवार की अन्य लडकियों के साथ वहां तक जाती हूं। लेकिन उस दिन मैं जानवरों की देखभाल में अपने पति की मदद कर रही थी, इसलिए मैंने उन्हें साथ जाने दिया। मैंने उनसे जल्दी लौट आने को कहा था।”
'इसे रोका जा सकता था'
एक पडोसी ने कहा कि उन्होंने कुछ लोगों को लडकियों को तंग करते हुए देखा था और इसकी जानकारी उन्होंने लडकियों के माता पिता को दी जिसके बाद वो पुलिस के पास पहुंचे।
परिजनों का कहना है कि वहां उन्हें दुत्कार मिली। पडोसी रमेश ने मुझे बताया कि उन्हें इस सब पर कोई हैरानी नहीं है। वो कहते हैं, “भले ही पुलिस ने कुछ कांस्टेबलों को निलंबित कर दिया हो, लेकिन उनकी जगह जो आएंगे, वो भी ऐसे ही होंगे। वे भी भेदभाव करेंगे।”
वो कहते हैं, “हमारी जाति के लोग गरीब हैं और अनपढ हैं और वो सत्ता और प्रभाव वाले पदों तक नहीं पहुंच पाते हैं।”
'पुलिस ने मेरा मजाक उडाया'
लडकी के पिता गरीब खेतिहर मजदूर हैं।
उनका कहना है कि जब वो गांव में बनी पुलिस चौकी में गए तो पडोसी ने जिन लोगों को लडकियों का कथित उत्पीडन करते हुए देखा था, उनमें से एक वहीं मौजूद था। पिता का दावा है कि पुलिस ने उनके छोटी जाति से होने का मजाक उडाया। “जो पहली बात मुझसे पूछी गई वो थी मेरी जाति, जब मैंने जाति बताई तो वो मुझे गालियां देने लगे।”
हालांकि पीडित और अभियुक्त दोनों ही अन्य पिछडे वर्ग से आते हैं लेकिन पीडित की जाति को निचली जाति समझा जाता है। लडकी के पिता का कहना है कि पुलिस अफसर और उनके साथ मौजूद वो व्यक्ति हंस रहे थे और उन्होंने कहा कि वो घर चले जाएं और लडकियां दो घंटे में वापस आ जाएंगी।
वो वापस चले गए और इंतजार करने लगे। अगली सुबह पुलिस ने उन्हें बताया कि लडकियां गांव के एक खेत में मिली हैं।
'हमारी जरूरतें अहम नहीं'
इस गांव के लोग खुद को बेबस महसूस कर रहे हैं। चुनावों में नेता उनके वोट मांगने आए थे, लेकिन उनकी जरूरतों का ख्याल किसी को नहीं है।
मारी गई लडकियों के परिवार की मित्र रत्ना का कहना है कि वो दौरा करने वाले अधिकारियों से लगातार शौचालयों के बारे में पूछती हैं, “लेकिन उनके लिए ये महत्वपूर्ण नहीं है।”
उनका कहना है कि जब किसी के पेट में कोई गडबड हो जाती है तो खेत तक जाना घोर मुसीबत बन जाती है। गरीबी के कारण ये लोग अपने घरों में शौचालय नहीं बनवा सकते हैं।
'किसी तरह का भेदभाव नहीं है'
इस गांव में कोई थाना नहीं है, बस एक पुलिस चौकी है। मुख्य पुलिस स्टेशन गांव से 45 किलोमीटर दूर हैं जहां वरिष्ठ अधिकारी अतुल सक्सेना किसी तरह का भेदभाव होने से इनकार करते हैं।
उनका कहना है जिस पल उन्हें परिवार वालों की तरफ से शिकायत मिली, उन्होंने पुलिसकर्मियों को निलंबित किया और तुरंत कदम उठाया। उन्होंने कहा, “इससे पता चलता है कि हम कुछ छिपाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि जाति कुछ भी हो, लेकिन अपराधी कानून की नजर में अपराधी है और पुलिस को मामले की ठीक से छानबीन करन के लिए कुछ समय चाहिए।