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Kargil Vijay Diwas: रामसमुझ की शहादत को आज भी नमन करता है ये गांव, महज 22 साल की उम्र में हो गए शहीद

Sat, 26 Jul 2025 05:40 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, आजमगढ़।

सार

Azamgarh News: उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में स्थित नत्थूपुर गांव के रामसमुझ यादव को आज भी याद किया जाता है। महज 22 साल की उम्र में उन्होंने अपनी जान गंवा दी थी। 
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गांव में लगी रामसमुझ यादव की प्रतिमा। - फोटो : अमर उजाला
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Kargil Vijay Diwas: कारगिल युद्ध में अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए नत्थूपुर गांव के सपूत शहीद रामसमुझ यादव ने 30 अगस्त 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए प्राणों का बलिदान दिया। 

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महज 22 वर्ष की उम्र में शहीद हुए रामसमुझ यादव का जन्म भी 30 अगस्त 1977 को हुआ था, यानी उन्होंने जिस दिन जन्म लिया, उसी तारीख को देश के लिए शहीद हो गए। शहीद के छोटे भाई प्रमोद यादव ने बताया कि रामसमुझ यादव द्वारा लिखी गई डायरी और कुछ निजी सामान को आज भी परिवार ने सहेजकर रखा है ताकि आने वाली पीढ़ियां उन्हें याद रखें।

शहीद रामसमुझ यादव का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता राजनाथ यादव और माता प्रतापी देवी हैं। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा अपने ननिहाल तुरकौली झंझवा गांव में प्राप्त की, जबकि हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई मौलाना आजाद इंटर कॉलेज अंजान शहीद से और स्नातक की पढ़ाई श्री गांधी पीजी कॉलेज मालटारी से की।

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आर्थिक तंगी में भी चुना सेना का रास्ता

आर्थिक तंगी के बावजूद रामसमुझ ने मेहनत-मजदूरी कर पढ़ाई पूरी की और देशसेवा के जज्बे के साथ वर्ष 1997 में वाराणसी से भारतीय सेना में भर्ती हुए। उन्हें 13 कुमाऊं रेजीमेंट में नियुक्ति मिली और पहली पोस्टिंग सियाचिन ग्लेशियर में हुई। 9 माह की कठिन ड्यूटी पूरी कर वह घर छुट्टी पर आ रहे थे, लेकिन कारगिल युद्ध शुरू होने के कारण छुट्टी रद्द कर दी गई और उन्हें सीधे युद्ध क्षेत्र में भेज दिया गया।

रामसमुझ यादव को 5685 पहाड़ी से दुश्मनों को खदेड़ने का मिशन मिला। 30 अगस्त 1999 की सुबह 5 बजे 13 कुमाऊं रेजीमेंट ने पहला हमला कर 21 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और पोस्ट पर कब्जा कर लिया। लेकिन उसी दौरान रामसमुझ यादव सहित 8 भारतीय जवान शहीद हो गए।

शव के साथ ही पहुंची बहन की भेजी राखी
31 अगस्त को तिरंगे में लिपटी रामसमुझ यादव की पार्थिव देह गांव पहुंचा तो पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। उसी दिन उनकी बहन द्वारा भेजी गई राखी और उनका पत्र भी घर पहुंचा, जिसे देखकर परिजनों का हृदय टूट गया। उनकी मां आज तक शहीद पार्क या उनकी मूर्ति के पास नहीं जातीं, और न ही घर में उनकी तस्वीर रखी गई है। तस्वीर देखते ही उनकी आंखें छलक पड़ती हैं।
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30 अगस्त को आयोजित होता है शहीद मेला
उनकी स्मृति में गांव में एक शहीद पार्क का निर्माण कराया गया है, जहां हर वर्ष 30 अगस्त को शहीद मेला आयोजित होता है। हजारों लोग इस आयोजन में शामिल होकर वीर सपूत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सरकार ने उनके परिवार को एक गैस एजेंसी और कुछ जमीन तो दी है, लेकिन कई वादे अब तक अधूरे हैं।
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