एक वृक्ष 10 पुत्र समान की कहावत का मर्म समझने वाले बहुत से लोग पौधों की अपने बेटे की तरह सेवा भी करते हैं लेकिन वन विभाग इसके प्रति गंभीर नहीं दिख रहा है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लाखों पौधे रोपे जाते हैं लेकिन संरक्षण के अभाव में पचहत्तर फीसदी पौधे नष्ट हो जाते हैं। ऐसे में वन विभाग के रिकार्ड में हरियाली तो छाई रहती है लेकिन मौके पर जमीन खाली दिखती है। स्थिति यह है कि जिले में महज 110 हेक्टेयर वन क्षेत्र है। वहीं हरियाली 0.6 फीसदी है। यही वजह है कि पर्यावरण असंतुलन बढ़ रहा है, जिसका खामियाजा सभी को भुगतना पड़ रहा है।
शासन के निर्देश पर महोत्सव मनाया गया लेकिन जिले में हरियाली नहीं आई। वन विभाग ने वित्तीय वर्ष 2021-22 में 5306000 पौधे रोपे थे। इनमें कितने सुरक्षित हैं और हरियाली कितनी बढ़ी, इसका कोई लेखा-जोखा विभाग के पास नहीं है। रोपे गए पौधे के आधार पर वन विभाग के कागजों में हरियाली है लेकिन हकीकत यह है कि हर वर्ष रोपे जाने वाले पौधों में 25 फीसदी भी सुरक्षित नहीं रहते हैं। जबकि पौधों की सुरक्षा के ट्री-गार्ड के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। पौधरोपण के बाद पौधों को सुरक्षित रखने पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता है। अगर रोपे गए पौधों में पचास फीसदी पौधे भी सुरक्षित हो गए होते तो भी जिले की हरियाली पर्याप्त होती। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हर साल पौधरोपण का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लक्ष्य की पूर्ति के लिए सभी विभागों को दिशा-निर्देश दिया जाता है। वन विभाग समेत अन्य विभाग मिलकर प्रतिवर्ष हजारों पौधे सड़कों के किनारे रोपित किए जाते हैं। पौधरोपण करते समय विभिन्न माध्यमों से इसका प्रचार तो किया जाता है लेकिन पौधों की सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं देता है। वन विभाग के अधिकारियों की मानें तो वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए भूमि की मांग को लेकर कई बार प्रशासन से पत्राचार किया गया है लेकिन भूमि उपलब्ध नहीं हो सकी। विभाग का कहना है कि उनके पास भूमि ही नहीं है। इसकी वजह से वन क्षेत्र नहीं बढ़ रहा है।