पांच दिवसीय लोक महोत्सव ‘देशज’ का समापन रविवार को विभिन्न नाटकों के मंचन, होली के गीत तथा ब्रज की होली की प्रस्तुतियों के साथ हुआ। नगर के जजी मैदान में बने रंग ग्राम में कलाकारों ने दर्शकों को बिना रंग के ही रंगों से सराबोर कर दिया। देशज के प्रशिक्षु कलाकारों ने संगीत नाटक अकादमी प्रोडक्शन की ओर से नाटक मंजरी की प्रस्तुति की। इसका निर्देशन नौटंकी विधा के विशेषज्ञ रामदयाल शर्मा ने किया।
कार्यक्रमों की प्रस्तुति सुबह दस बजे से ही शुरू हो गई थी। छत्तीसगढ़ के नाचा गम्मत शैली में राजा फोकलवा नाटक का मंचन रायपुर से आई चित्रोत्पला लोककला परिषद के कलाकारों ने किया। इस मंचन में कलाकारों ने वर्तमान समय की सत्ता और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को दर्शाया। इसके बाद, नारायण सेवा संस्थान कटिहारी के कलाकार रणविजय शाही और उनके साथियों ने होली के साथ फागुआ गाकर श्रोताओं को भावरंगों से सराबोर कर दिया।
इसके बाद दोपहर में नौटंकी विधा में मथुरा से आए लतारानी ब्रजकला संस्थान के कलाकारों ने ‘पदमावती का झूला’ नाटक की प्रस्तुति की, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा। इसमें राजकुमारी पद्मावती अपने प्यार को पाने के लिए यत्न करती है और अंत में सफल हो जाती है। अपराह्न दो बजे संगीत विधा से मथुरा वृंदावन से आए उमेश शर्मा ब्रज संपदा रंगशाला के कलाकारों ने कामदकंदला नाटक की प्रस्तुति की। इस प्रस्तुति में एक अमर प्रेम गाथा का वर्णन दिखा।
मथुरा से आए ब्रज लोक माधुरी के कलाकारों ने देवेंद्र शर्मा के निर्देशन में विषय वस्तु के माध्यम से नौटंकी के बदलते स्वरूप की प्रस्तुति की। इसमें नौटंकी के उत्थान और पतन के बाद विलुप्त होने के कारणों को दर्शाया गया। स्वांग से कब और कैसे नौटंकी का जन्म हुआ, कालांतर में क्यों और कैसे यह विधा लोकप्रिय थी, फिर अचानक इसका पतन शुरू हुआ। अपराह्न चार बजे के करीब मध्यप्रदेश उज्जैन से आए प्रह्नलाद सिंह टिपनिया एवं उनके कलाकारों ने निर्गुण गायन की प्रस्तुति की।
शाम पांच बजे इलाहाबाद की विनोद रस्तोगी स्मृति संस्थान के कलाकारों ने आतमजीत सिंह के निर्देशन में ‘लैला मजनूं’ नाटक का मंचन किया। इसमें लैला और मजनूं के इश्क की जीवंत प्रस्तुति कर कलाकारों ने तालियां बटोरीं। शाम को साढ़े छह बजे के करीब नौटंकी विधा में भक्त पूरनमल का मंचन किया गया। मथुरा से आए ब्रज नौटंकी कला केंद्र के कलाकारों ने इस मंचन में दर्शाया की साफ सुथरी मुहब्बत ही परवान चढ़ती है। इस कहानी से ऐसी ही शिक्षा मिली। रात को आठ बजे के करीब ब्रज की होली का सजीव मंचन मथुरा के श्रुतिपुरी एवं दल के कलाकारों ने किया। इसमें भगवान कृष्ण गोपियों के संग फूलों की होली खेलते हैं। गीतों को सुनकर लोग झूम रहे थे।