बदले समय के साथ ही होली के परंपरागत तौर तरीकों में बदलाव आया है। आधुनिकता के दौर में होली पर गाए जाने वाले चहका और चौताल अब कहीं सुनने को नहीं मिलते हैं। इससे युवा पीढ़ी को कोई मतलब नहीं है। उन्हें तो बस डीजे की धुन पर थिरकने से मतलब है। उसे चहका और चौताल के बारे में जानकारी भी नहीं है।
एक समय था जब बसंती पंचमी के दिन से ही गांवों में फागुनी गीतों की गूंज सुनाई पड़ती थी। गांव-गांव मतवालों की टोली एक जगह जमा होकर चहका और चौताल गाती थी। पूरे गांव के लोग बैठकर उसका आनंद लेते थे। साथ ही उनके द्वारा गायकों की हौसला आफजाई भी की जाती थी। वहीं घरों की महिलाएं घरों में पकवान बनाती थी जिसे कीर्तन मंडली को खाने के लिए परोसती थी। देर रात तक लोग फाल्गुनी गीतों का आनंद लेते थे। जिसके दरवाजे पर यह मंडली बैठती थी वह ठंडई की व्यवस्था करता था लेकिन समय के साथ इसमें काफी बदलाव आया है। नई पीढ़ी को इससे कोई मतलब नहीं रह गया है। शराब का प्रचलन बढ़ा है और ज्यादातर युवा नशे में नजर आते हैं। चहका और चौताल से उनका कोई लेना देना नहीं रहता है। पहलवानपुर गांव के राजेश राय ने बताया कि हमारे गांव में पहले बहुत अच्छी टीम थी। बसंत पंचमी से ही किसी न किसी के दरवाजे पर फागुनी गीतों की तान छेड़ी जाती थी। सब लोग रोजी रोटी के चक्कर में बाहर क्या गए तो यह कार्य पूरी तरह से बंद हो गया। नई पीढ़ी की इसमें कोई रुचि नहीं है। फरेंदा गांव निवासी संजय कुमार ने बताया पहले की तरह अब होली नहीं मनाई जाती है। आधुनिकता ने इसकी मिठास को गायब कर दिया है।